छठे नवरात्र पर मां बगलामुखी के दर्शन, जानिए क्या है मंदिर का इतिहास

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15 अप्रैल को सातवें नवरात्र पर पढ़े मां भगायनी देवी से जुड़ा इतिहास व मान्यताएं।

हिमखबर – डेस्क 

आज चैत्र नवरात्रि का छठा दिन है यानी आज मां कात्यायनी की पूजा की जाती है। माता कात्यायनी चार भुजाधारी हैं। माता के स्वरूप में एक भुजा में शत्रुओं का अंत करने वाली तलवार, दूसरी भुजा में पुष्प जो भक्तों के प्रति स्नेह, तीसरी भुजा अभय मुद्रा जो भक्तों को भय मुक्ति प्रदान करने का प्रतीक है।

चौथी भुजा देवी का वर मुद्रा में है जो भक्तों को उनकी भक्ति का वरदान देती है। तो आइए मां कात्यायनी का नाम लेकर हम आपको शक्तिपीठ मां बगलामुखी की और ले चले।

आइए जाने क्या है मंदिर का इतिहास

शक्तिपीठ मां बगलामुखी हिमाचल के कांगड़ा जिला से लगभग 30 किमी दूर स्थित है। मां बगलामुखी का हिंदू पौराणिक कथाओं में दस महाविद्याओं में आठवां स्थान है।

माता को पीला रंग बहुत प्रिय है, इसलिए मंदिर का रंग, मां के वस्त्र, प्रसाद, मौली और आसन से लेकर सब कुछ पीला ही होता है।

मान्यता है कि युद्ध हो या राजनीति, कोर्ट-कचहरी के विवाद मां के मंदिर में यज्ञ कर हर कोई मन वांछित फल पाता है। यदि आपके जीवन का कोई लक्ष्य हो और किसी कारणवश उसमें रुकावट आ रही हो तो सच्चे मन से माता की आराधना से आपको लक्ष्य की प्राप्ति होती है।

मंदिर का इतिहास महाभारत से भी जुड़ा है कहा जाता है कि पांडवों ने भी अज्ञातवास के दौरान मां का मंदिर बनवा पूजा अर्चना की थी। पहले रावण और उसके बाद लंका पर जीत के लिए श्रीराम ने शत्रु नाशिनी मां बगलामुखी की पूजा कर विजय प्राप्त की थी। मां को पीतांबरी के रूप में भी जाना जाता है।

बगलामुखी से जुड़ी कथा  

कहा जाता है कि सतयुग में सम्पूर्ण जगत को नष्ट करने वाला भयंकर तूफान आया। जिस पर देवता चिंता करने लगे और हरिद्रा सरोवर के समीप जाकर भगवती को प्रसन्न करने के लिए तप करने लगे।

श्री विद्या ने उस सरोवर से बगलामुखी रूप में प्रकट होकर उन्हें दर्शन व विध्वंसकारी तूफान को शांत किया। मंगल युक्त चतुर्दशी की अर्धरात्रि में इसका प्रादुर्भाव हुआ था। श्री बगलामुखी को ब्रह्मास्त्र के नाम से भी जाना जाता है।

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