हिमखबर डेस्क
हिमाचल प्रदेश का सिरमौर जिला अपनी वीरता, त्याग और देशभक्ति की परंपरा के लिए जाना जाता है। इसी भूमि ने ऐसे अनगिनत सपूतों को जन्म दिया है जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर देश का मस्तक ऊंचा किया। उन्हीं में से एक थे शहीद कल्याण सिंह, जिन्होंने 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान आतंकवादियों से लोहा लेते हुए वीरगति प्राप्त की।
साल 1999 में जब कारगिल में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध छिड़ा, तो हिमाचल प्रदेश के 52 वीर जवानों ने अपने प्राण देश के लिए समर्पित किए। इन्हीं में से एक थे शहीद कल्याण सिंह, जो सिरमौर जिले के गिरिपार के छोटे से गांव हलाहां के रहने वाले थे। 1996 में उन्होंने भारतीय सेना जॉइन की थी। उस दौर में उनके इलाके से बहुत ही कम लोग सेना में भर्ती होते थे। कल्याण सिंह ने कठिन परिश्रम और अदम्य इच्छाशक्ति के बल पर सेना में प्रवेश पाया और परिवार का गौरव बन गए।
सिर्फ ढाई साल की सैन्य सेवा के बाद ही जब कारगिल युद्ध की आहट सुनाई दी, तो कल्याण सिंह भी उस मोर्चे पर डट गए। जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा क्षेत्र में आतंकवादियों के खिलाफ चल रहे अभियान में उन्होंने असाधारण साहस का परिचय दिया। 31 जुलाई 1999 को देश की रक्षा करते हुए वे वीरगति को प्राप्त हो गए।
उस दौर में गावों में न तो मोबाइल फोन थे और न ही संचार के अन्य साधन। परिवार को कल्याण सिंह की शहादत की खबर मिलने में दो-तीन दिन लग गए। 01 अगस्त 1999 को तहसीलदार शिलाई को यह सूचना मिली कि हलाहां गांव का सपूत कल्याण सिंह शहीद हो गया है। उन्होंने ही ग्रामीणों तक यह संदेश पहुंचाया।
शहीद कल्याण सिंह के भाई कुंदन सिंह बताते हैं कि उस समय उनके परिवार के एक बुजुर्ग व्यक्ति नाहन मेडिकल कॉलेज में भर्ती थे। जब गांव के लोग इकट्ठा होकर सड़क की तरफ दौड़े, तो उन्हें लगा कि शायद उनका देहांत हो गया है। इसका किसी को इल्म भी नहीं था कि उनका बेटा शहीद हो गया है। गांव तक सड़क नहीं थी लिहाजा वहां से 2 किलोमीटर पैदल सफर करना था।
इस बीच परिवार को भी इसकी सूचना दे दी गई थी। भाई बताते हैं कि बड़ी संख्या में उस समय गांव में सेना के जवान पहुंचे थे और उन्हें हर जवान में अपना भाई नजर आ रहा था। इसके बाद पूरे गांव में मातम छा गया। माता सुला देवी और पिता भूप सिंह को यह यक़ीन ही नहीं हुआ कि उनका सबसे छोटा बेटा अब नहीं रहा। तीन भाइयों में सबसे छोटे कल्याण सिंह की उम्र उस समय सिर्फ 22 वर्ष थी।
कल्याण सिंह के परिवारजन बताते हैं कि बचपन से ही उनका सपना था कि वे सेना में भर्ती हों और देश की सेवा करें। पहली बार जब वे भर्ती परीक्षा में असफल हुए, तो उन्होंने हार नहीं मानी। और अगले ही प्रयास में सफलता प्राप्त कर ली। यह उनके दृढ़ निश्चय का परिचायक था।
सेना में भर्ती होने से पहले ही उनकी शादी शीला देवी से हो चुकी थी। उस दौर में प्रथा थी कि 18 वर्ष की आयु पूरी होते ही युवकों का विवाह कर दिया जाता था। जब वे शहीद हुए, तब उनकी एक छह से सात महीने की बेटी थी। इतनी मासूम उम्र में जिसने अपने पिता का चेहरा तक नहीं देखा था।
संयुक्त परिवार में पले-बढ़े कल्याण सिंह के परिवार ने उनकी बेटी को कभी पिता की कमी महसूस नहीं होने दी। बड़े भाइयों ने उसे अपनी बेटी की तरह पाला। समय के साथ सबने खुद को संभाला, लेकिन बेटे की याद माता-पिता के दिलों में हमेशा जिंदा रही।
शहादत के एक साल बाद गांव के युवाओं और पंचायत ने मिलकर उनके नाम पर “शहीद कल्याण सिंह मेमोरियल खेल-कूद प्रतियोगिता” शुरू की। यह उनके प्रति गांव और क्षेत्र का सच्चा सम्मान था। आज उनके नाम से गांव में एक विद्यालय और एक सड़क भी है। “शहीद कल्याण सिंह मार्ग”, जो हलाहां गांव तक जाती है।
आज शहीद कल्याण सिंह की बेटी उषा ठाकुर लगभग 26 वर्ष की हैं और सिविल सेवाओं की तैयारी कर रही हैं। वह अपने पिता की स्मृतियों को गर्व और श्रद्धा के साथ याद करती हैं। उषा कहती हैं कि “मुझे गर्व है कि मेरे पिता ने देश के लिए अपने प्राण दिए, लेकिन अफ़सोस है कि मुझे कभी उन्हें देखने का मौका नहीं मिला। जो कुछ भी उनके बारे में जानती हूं, वो सिर्फ मां और परिवार से सुनी बातें हैं।
पुत्र की शहादत के बाद माता-पिता का जीवन गहरे दुख में बीता। 2014 में पिता भूप सिंह का निधन हो गया, और 2017 में माता सुला देवी ने भी संसार त्याग दिया। अब परिवार में बड़े भाई केदार सिंह (65 वर्ष) और छोटे भाई कुंदन सिंह (62 वर्ष) हैं। दोनों भाइयों ने हमेशा अपने छोटे भाई के परिवार को संभाले रखा। सरकार की ओर से शहीद को पूरा सम्मान दिया गया। परिवार के एक सदस्य को नौकरी भी प्रदान की गई। लेकिन परिवार का कहना है कि सम्मान मिलने के बावजूद बेटे की कमी कभी पूरी नहीं हो सकती।
आज भी जब बेटी उषा अपने पिता को याद करती हैं, तो आंखें नम हो जाती हैं। वह कहती हैं कि “पिता मेरे लिए सिर्फ एक नाम नहीं, एक प्रेरणा हैं। उन्होंने अपने बलिदान से यह सिखाया कि देश से बड़ा कुछ नहीं।” शहीद कल्याण सिंह की कहानी सिर्फ सिरमौर नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए गर्व की बात है।
एक छोटे से गांव का युवा जिसने 22 वर्ष की उम्र में देश की रक्षा करते हुए प्राण न्योछावर कर दिए। वह सच्चे अर्थों में भारत मां का वीर सपूत था। उनकी वीरता, त्याग और समर्पण आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा है। उनका नाम सदैव अमर रहेगा।

