पहले 900 रुपये से खुद शुरू किया कारोबार, फिर 15 हजार महिलाओं को दिया स्वरोजगार

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बिलासपुर – सुभाष चंदेल

महिलाओं के लिए प्रेरणास्रोत बनी जिला बिलासपुर (हिमाचल प्रदेश) के कंदरौर से संबंध रखने वाली निर्मला करीब 15,000 महिलाओं को स्वरोजगार की राह दिखा चुकी हैं। इन्होंने मशरूम उत्पादन को स्वरोजगार का जरिया बनाया।

इनके सराहनीय प्रयासों के लिए वर्ष 2021 में मशरूम रिसर्च सेंटर चंबाघाट, सोलन ने राष्ट्रीय अवार्ड से सम्मानित किया। निर्मला अपने घर पर स्वावलंबन केंद्र का संचालन करती हैं। यहां चीड़ की पत्तियों से हैंड मेड प्रोडक्ट बनाना सिखाती हैं।

साथ ही मशरूम उत्पादन भी करती हैं। वह बताती हैं कि अब मशरूम उत्पादन से छह महीने के एक सीजन में दो से ढाई लाख रुपये का मुनाफा हो जाता है।

कैसे की शुरुआत

महिला किसान निर्मला धीमान ने साल 2000 में 900 रुपये में 36 बैग खरीद कर मशरूम उत्पादन शुरू किया। इसमें उन्होंने पहली फसल से 35,000 रुपये मुनाफा कमाया। साल 2002 में 20 महिलाओं को जोड़कर स्वयं सहायता समूह बनाया।

समूह को सरकार के आतमा प्रोजेक्ट से जोड़ा। प्रोजेक्ट से 20,000 रुपये की सहायता राशि मिली। इससे समूह ने बड़े स्तर मशरूम का उत्पादन करना शुरू किया। साल 2012 में मशरूम रिसर्च सेंटर चंबाघाट, सोलन से प्रशिक्षण भी प्राप्त किया। निर्मला धीमान के कदम आगे बढ़ाए तो मेहनत का किस्मत ने भी साथ दिया।

अपने घर पर महिलाओं को दे रही हैं प्रशिक्षण

निर्मला ने बताया कि वह अपने ही घर पर मशरूम की खेती महिलाओं को सिखा रही हैं। इसके साथ चीड़ की पत्तियों के उत्पाद भी तैयार किए जा रहे हैं। अपने घर पर राष्ट्रीय सहकारिता संघ की ओर से लगभग तीन महीने का एक कैंप लगाया था।

इसमें महिलाओं को प्रशिक्षण दिया कि किस तरह चीड़ की पत्तियों के उत्पाद तैयार किए जाते हैं। निर्मला ने बताया कि महिलाएं इनसे विभिन्न तरह के घरेलू उत्पाद तैयार कर रही हैं। चीड़ की पत्तियों के उत्पाद सबको भा रहे हैं। चीड़ की पत्तियों से टोकरी, चपाती बाक्स, फूलदान सहित अन्य उत्पाद तैयार कर रही हैं और अब आभूषण भी तैयार किए जा रहे हैं।

इन उत्पादों की कीमत 250 से 1,200 रुपये तक है। इन उत्पादों को तैयार करने में दो से पांच दिन लगते हैं। बाजार में इनकी बहुत मांग हैं। देश भर में राष्ट्रीय सहकारिता संघ की प्रदर्शनियों में इन उत्पादों को रखा जाता है।

कहां से मिली प्रेरणा

निर्मला ने बताया कि एक बार वह मशरूम के प्रशिक्षण शिविर के लिए गई हुई थी वहां पर उन्होंने एक दिव्यांग महिला को मशरूम का उत्पादन करते हुए देखा। उस दिव्यांग महिला से प्रेरित होकर मशरूम के क्षेत्र में कार्य करने की ठान ली।

उन्होंने कहा कि समाज में महिलाओं को कमजोर समझा जाता है। इसलिए लोगों को यह साबित करने के लिए कि महिलाएं भी बहुत कुछ कर सकती हैं यही जज्बा उनके लिए हमेशा प्रेरणा देता रहा।

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