डलहौजी में टार्च की लाईट से पड़ने को मजबूर बिटिया

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चम्बा- भूषण गूरुंग

आजादी के 75 वर्ष बीत जाने के बाद भी थोड़ी बहुत बर्फ बारी  होते ही डलहौजी और आसपास के क्षेत्रों मे कई कई दिनों तक बिजली गुल हो जाती है।

हमे आज़ाद हुए 75 वर्ष हो गए लेकिन शायद चम्बा ज़िला का डलहौज़ी ऐसा शहर होगा जो विकास के बजाए गर्त में जा रहा है। अंडेमान जो कि ब्रिटिश हकूमत में काला पानी की सज़ा के लिए विख्यात था वही हालात डलहौजी में बर्फबारी के दौरान देखने को मिल सकते है। पर्यटक फंसे हुए है । बिजली ठप्प है।

किसी भी किसी नेता ने यह कोशिश नही की की बर्फबारी के दिनों आम इंसान किस हालात में डलहौज़ी में जीता है । वैसे तो ज्यादातर लोग बर्फबारी के दिनों यहां से पलायन कर जाते हैं क्यूंकी उनको इस जन्नत की हक़ीक़त पता है ।

यहां के लोगों को मात्र यह झुनझुना दे दिया जाता है कि प्रकृति के आगे किसी की नही चलती लेकिन  डलहौज़ी का एक इलाका ऐसा भी है जहां प्रकृति का कोई ज़ोर नही चलता क्योंकि वहां अधिकारी लोग रहते है । वहां बिजली की क्या मज़ाल की चली जाए या बर्फ से रास्ता बंद हो जाये । यह सब प्राकृतिक आपदाएं तो सिर्फ आम लोगों के लिए है ।

हैरानी होती है जब डलहौज़ी को अंतरराष्ट्रीय पर्यटन स्थल बोलते हैं। हालात तो किसी गांव से भी बदतर। सरकारी बैठकों में सब हवा हवाई बातें होती है लेकिन धरातल में वहीं ढाक के तीन पात ।

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