हिमखबर डेस्क
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य प्रशासनिक न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) के उस पुराने आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें सहकारिता विभाग के निरीक्षकों को पंजाब की तर्ज पर उच्च वेतनमान देने का निर्देश दिया गया था।
खंडपीठ ने राज्य की याचिका को स्वीकार करते हुए कहा कि सरकार अपने कर्मचारियों को पंजाब के समान वेतनमान देने के लिए कानूनी रूप से बाध्य नहीं है।
मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि ऐसा कोई सांविधानिक या वैधानिक नियम नहीं है, जो राज्य सरकार को पंजाब के वेतन नियमों या सेवा शर्तों को ज्यों का त्यों अपनाने के लिए मजबूर करे।
न्यायाधिकरण ने अपनी शक्तियों की सीमा का उल्लंघन किया:हाईकोर्ट
हाईकोर्ट ने 2018 के आदेश पर टिप्पणी करते हुए कहा कि न्यायाधिकरण ने अपनी शक्तियों की सीमा का उल्लंघन किया है। कोर्ट ने कहा कि अदालतें या ट्रिब्यूनल मौजूदा वैधानिक नियमों को फिर से नहीं लिख सकते और न ही कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप कर सकते हैं।
खंडपीठ ने कहा कि वेतनमान का निर्धारण, काडर का विलय या चयन ग्रेड देना पूरी तरह से कार्यपालिका का क्षेत्राधिकार है।
एक जैसे पदनाम होने पर समान वेतन का दावा गलत
खंडपीठ ने कहा कि यदि राज्य ने अतीत में पंजाब पैटर्न को अपनाया था, तो इसका मतलब यह नहीं है कि वह भविष्य में पंजाब की ओर से किए गए हर बदलाव को लागू करने के लिए बाध्य है।
जब तक सरकार अलग से अधिसूचना जारी कर किसी नए नियम को स्पष्ट रूप से स्वीकार नहीं करती, तब तक वह प्रभावी नहीं होगा। केवल इसलिए कि पंजाब-हिमाचल में पद का नाम एक जैसा है, कर्मचारी समान वेतन का दावा नहीं कर सकते।
सहकारिता विभाग के निरीक्षकों ने मांग की थी कि उन्हें 1 जनवरी 1986 से पंजाब सरकार की तर्ज पर 1800-3200 का वेतनमान दिया जाए। ट्रिब्यूनल ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया था।
शैक्षणिक योग्यता अधिक होने के आधार पर कर्मचारी को हटाना गलत : हाईकोर्ट
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि शैक्षणिक योग्यता अधिक होने के आधार पर किसी कर्मचारी को हटाना गलत है। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने बैंक की कार्रवाई को कोर्ट के आदेश की अवहेलना माना है।
अदालत ने बैंक के 31 मार्च 2015 के उस आदेश को रद्द करते हुए याचिकाकर्ता को सेवाओं में बने रहने और उन्हें सभी परिणामी लाभ देने के आदेश दिए हैं।
यह मामला वर्ष 2014-15 का है, जब याचिकाकर्ता चरणजीत सिंह ने एक बैंक में चपरासी-सह-फर्राश के पद के लिए आवेदन किया था। विज्ञापन के अनुसार उम्मीदवार की योग्यता जमा दो से कम होनी चाहिए थी।
याचिकाकर्ता का चयन मेरिट के आधार पर हो गया, लेकिन बैंक ने उन्हें नियुक्ति देने से यह कहकर मना कर दिया कि उनकी शैक्षणिक योग्यता निर्धारित सीमा (12वीं) से अधिक है।
कोर्ट ने अंतरिम आदेश में ये कहा
इसके खिलाफ याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। कोर्ट ने अंतरिम आदेश देते हुए बैंक को निर्देश दिया कि उन्हें ड्यूटी पर ज्वाइन करने दिया जाए। हाईकोर्ट ने बैंक की ओर से नियुक्ति देने के बाद याचिका का निपटारा कर दिया।
अदालत की ओर से याचिका निपटाए जाने के बाद 31 मार्च 2015 को बैंक ने एक आदेश जारी किया। आदेश में तर्क दिया कि चूंकि हाईकोर्ट ने याचिका निपटा दी है, इसलिए पिछला अंतरिम आदेश भी खत्म हो गया है और याचिका को खारिज मानते हुए याचिकाकर्ता को सेवा से स्थायी रूप से मुक्त कर दिया गया।
इसी आदेश को याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। अदालत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया कि पिछली याचिका को निपटाया गया था, खारिज नहीं की गई। बैंक का यह कहना कि याचिका खारिज हो गई है, पूरी तरह गलत है।
अदालत ने कहा कि यदि बैंक को कोई आपत्ति थी, तो उसे स्पष्टीकरण या पुनरीक्षण के लिए वापस कोर्ट जाना चाहिए था। बैंक स्वयं यह तय नहीं कर सकता कि अदालती आदेश का क्या अर्थ है।

