परमवीर चक्र विजेता मेजर सोमनाथ शर्मा ने एक हाथ में प्लास्टर होने के बावजूद दूसरे में मशीन गन लेकर 700 दुश्मनों का किया सामना
हिमखबर डेस्क
आज भारत के मूकुट कश्मीर का जो हिस्सा भारत के पास है, उसका श्रेय जिन वीरों को है, उनमें से वीरभूमि हिमाचल के मेजर सोमनाथ शर्मा का नाम सबसे आगे है। हाथों में पहले से ही प्लास्टर होने के बावजूद मेजर सोमनाथ घायल अवस्था में ही 700 पाकिस्तानी सैनिकों को खदेड़ते रहे।
परमवीर चक्र भारत का सबसे बड़ा सैन्य पुरस्कार है। आजाद भारत के इतिहास में अभी तक केवल 22 लोगों को ये पुरस्कार मिला है। भारत का पहला परमवीर चक्र मेजर सोमनाथ शर्मा को 1947 को मरणोपरांत प्रदान किया गया था। सबसे बड़े द्वीप का नाम भी मेजर सोमनाथ शर्मा के नाम पर रखा गया।
मेजर सोमनाथ शर्मा का जन्म 31 जनवरी, 1923 को पालमपुर के डाढ़ गांव में हुआ था। भारतीय सेना की कुमाऊं रेजिमेंट की चौथी बटालियन की डेल्टा कंपनी के कंपनी कमांडर थे, जिन्होंने अक्तूबर-नवंबर 1947 के भारत-पाक संघर्ष में अपनी वीरता से शत्रुओं के छक्के छुड़ा दिए।
उनका फौजी कार्यकाल शुरू ही दूसरे विश्व युद्ध के दौरान हुआ और वह मलाया के पास के रण में भेज दिए गए। 15 अगस्त, 1947 को भारत के स्वतंत्र होते ही देश का दुखद विभाजन भी हो गया। इसी दौरान तीन नवंबर, 1947 में पाकिस्तानी सेना ने भारत पर हमला कर दिया।
इस समय मेजर शर्मा के दाएं हाथ में फ्रैक्चर था, फिर भी वो युद्ध में गए। मेजर सोमनाथ शर्मा की टुकड़ी में उस समय कुल 50 जवान थे। हाथ में प्लास्टर लगे होने के बावजूद मेजर सोमनाथ जवानों की मदद करते रहे। शहीद होने से पहले मेजर शर्मा ने ब्रिगेड मुख्यालय को भेजे आखिरी संदेश में कहा था कि जब तक हमारा एक भी सैनिक जिंदा है, और हमारी बंदूक में एक भी गोली है, हम एक इंच भी पीछे नहीं हटेंगे।
बडग़ाम की लड़ाई में मेजर सोमनाथ शर्मा, सूबेदार प्रेम सिंह मेहता और 20 अन्य जवान शहीद हुए। भारतीय सैनिकों ने 200 से ज्यादा हमलावरों को मार गिराया था। 21 जून,1950 को मरणोपंरात वीरभूमि हिमाचल के शुरवीर को देश के पहले परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।
परिवार से मिला देशभक्ति का जज्बा
31 जनवरी, 1923 को कांगड़ा जिला में पालमपुर के डाढ़ में जन्मे सोमनाथ को देश-प्रेम विरासत में मिली थी। उनके पिता अमरनाथ शर्मा आर्मी में मेजर जनरल थे, जो बाद में भारत की सशस्त्र चिकित्सा सेवाओं के पहले महानिदेशक बने। उनके चाचा कप्तान केडी वासुदेव, द्वितीय विश्व युद्ध में मलायन अभियान के दौरान जापानियों के खिलाफ नदी के स्लिम पर एक पुल का बचाव करते हुए शहीद हो गए थे।
जाहिर तौर पर वीरता के किस्से सुनकर वह बड़े हुए, नैनीताल के शेरवुड कालेज से शुरुआती शिक्षा लेने के बाद सोमनाथ उच्च शिक्षा के लिए देहरादून गए। उसके बाद उन्होंने खुद को पूरी तरह से सेना के लिए झोंक दिया। 22 फरवरी, 1942 को वह भारतीय सेना की 19वीं हैदराबाद रेजिमेंट का हिस्सा बने।

