श्रीमद् भागवत कथा, रक्कड़, कांगड़ा (हि. प्र.)
मनुष्य की सबसे बड़ी भूल यह है कि वह करना कुछ नहीं चाहता जबकि स्वर्ग में पहुंचाना चाहता है। हम यह नहीं सोचें की हमारे बारे में लोग क्या कहेंगे।
लोग तो तभी कुछ कहते ही थे जब हम कुछ नहीं कर रहे थे। आनंद के अतिरिक्त परमात्मा के निकट पहुंचने का और कोई द्वार नहीं है।
यदि हमें परमात्म सुख चाहिए तो स्वयं आनंद से भर जाना होगा। हम अगर दुख या चिंता में जी रहे हैं तो इसके लिए हम स्वयं जिम्मेदार हैं भगवान नहीं।
उक्त अमृतवचन परम श्रद्धेय अतुल कृष्ण जी महाराज ने श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस में रक्कड़ में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि हम चाहें तो अपनी जिन्दगी फूलों से भर सकते हैं। हम सरल हो जाएं एक बच्चे की तरह।

हम इंसान से ही नहीं मिल पा रहे हैं तो भला परमात्मा से कैसे मिल सकेंगे। भक्ति में अभी हम स्वयं गंभीर नहीं हैं। जिस दिन मन से प्रभु की ओर चल पड़ेंगे उस दिन से उन अनंत का महाप्रसाद मिलना प्रारंभ हो जाएगा।
अतुल कृष्ण ने कहा कि प्रभु नाम का दिया जला लेने से शरीर रूपी महल में प्रकाश हो जाता है। भगवान के नाम से जन्म-जन्मान्तर की दरिद्रता सदा के लिए ही मिट जाती है। ईश्वरीय प्रेम के आगे संसार के सारे वैभव तुच्छ हैं। जीवन में सारवस्तु एक प्रभु ही हैं। बिना भगवान के सारा संसार शून्य के समान है।

आज कथा में पूतना का उद्धार, शकटासुर एवं तृणावर्त का वध, कुबेर के पुत्रों पर कृपा, माखन चोरी, ब्रह्मा जी के मोह को दूर करना, चीर हरण एवं श्रीगिरिराज पूजन का प्रसंग श्रोताओं ने अत्यंत ही श्रद्धा से सुना। भगवान को 56 भोग भी अर्पित किया गया।

