वतन की चिट्ठी, वतन की मिट्टी

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तीन पहर बीते- अब एक पहर की मुट्ठी बाकि है

लेख़क- बालक राम शर्मा

पहर तो बीत गये, बस एक पहर ही बाकी है
जीवन हाथों से फिसल गया, बस खाली मुट्ठी बाकी है
सब कुछ पाया इस जीवन में, फिर अभी इच्छाएं बाकी है,

इस दुनिया से हमने क्या पाया, इस लेखे-जोखे का नाटक बहुत हुआ,
इस जग ने हमसे क्या पाया, बस ये गिनती बाकी है
इस भाग-दौड़ की दुनिया में, हमको इक पल का होश नहीं,

वैसे तो जीवन सुखमय है, फिर भी क्यों हमें संतोष नही,
क्या ये जीवन युं ही बीतेगा, बस क्या जीवन की यूं ही ये सांसें थम जायेगी,
औरों की पीड़ा देख समझ नहीं पाया, अपनी ये आंखें कब नम होंगी,

मन के अंदर कहीं छिपे हैं कई सवाल, इन सवालों का उत्तर बाकी है,
मेरी खुशियां मेरे सपने, हम सब कहते मेरे बच्चे मेरे अपने,
यह कहते कहते शाम हुई, इससे पहले हम कुछ समझ नहीं पाए,

जाते जाते इस पहले कि ये शाम ढले, कुछ दूर दिखा परायी बस्ती में,
अभी इक दीप जलाना बाकी है, तीन पहर तो बीत गये,

बस एक पहर ही बाकी है, जीवन हाथों से फिसल गया,
बस खाली इक पहर की मुट्ठी बाकी है.

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