हिमखबर डेस्क
मंदिर का इतिहास
श्री का मंदिर अपनी धुरी पर घूमता करता था। इस समय ऐसी व्यवस्था नहीं है। 1905 ई. के भूकम्प में इसे क्षति पहुँची थी। शायद उस समय तक कोई व्यवस्था हो या सम्भव है गर्भगृह इस प्रकार का हो और अपनी धुरी पर घूमता हो। चाहे कुछ हो, मंदिर वास्तुकला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। मंदिर में लगी लकड़ी पर एक-एक स्तम्भ और प्रवेश द्वार पर चित्रकारी हुई है। विष्णु, ब्रह्मा, शिव, कार्तिकेय, गणेश, नव ग्रह, गंगा, यमुना, सरस्वती, गन्धर्व, यक्ष इत्यादि देवताओं और असुरों की मूर्तियाँ लकड़ी पर खोदी गई हैं।
गर्भगृह में निर्मितियाँ आठवीं शताब्दी की हैं। गर्भगृह में मानवाकार शक्तिदेवी अष्टधातु की मूर्ति है। इसे भी मूर्तिकार ने आभूषणों और वस्त्रों से सुसज्जित किया है। मूर्ति के नीचे एक कमल पर इसे खड़ा किया गया है। इसे बंधे से पात वस्त्र धोती पहने दिखाया है। बंधे पर दुपट्टा लपेटा दिखाया है। कानों में कुण्डल, बाँहों में बाजूबन्द, गले में मोतियों का हार और पांवों में नूपुर स्पष्ट दिखाई देते हैं। सिर पर मुकुट पहना है।
देवी की मूर्ति के नीचे, कमल के निचले भाग पर ब्राह्मी लिपि में अपभ्रंश में शिलालेख की पंक्तियाँ हैं जिनका विवरण Hutchison ने अपनी पुस्तक Antiquities of Chamba में इस प्रकार लिखा है—
“ओम्।।
आसीच्छि शुद्ध कुलधुर्यवाहः श्री देववर्मति प्रसिद्ध कीर्ति।
तस्य सुतः सर्वगुणामिरामः श्री मेरुवर्मा प्रथित यशः पृथिव्याम्।।
माता पिता पुण्यानि भित्तं पूर्व करिता भक्ति एव शक्ति।
जित्वा रिपृन्दुर्जय दुर्ग संस्थां कीर्ति यशोधर्म विवर्धितत्युः।।
कृतं कर्मिणा गुग्गेन।”
उच्च वंश में पैदा हुए प्रसिद्ध योद्धा देव वर्मा के पुत्र मेरु वर्मा ने, जो इस भू पर कीर्तिमान और सर्वगुण सम्पन्न थे, अपने माता-पिता की अध्यात्म समृद्धि और भक्ति से प्रेरित हो, दुर्जय शत्रुओं के दुर्गन किलों को विजित कर, शक्ति की इस मूर्ति को निर्मित कर, प्रसिद्धि और धार्मिक गुणों से जीवन को सफल किया है।
मेरु वर्मा ने छतराड़ी के आसपास के राणाओं के किलों को विजित किया। इससे यह भी पता लगता है कि उसके समय का एक प्रसिद्ध मूर्तिकार था जिसने तीन भरमौर की और एक छतराड़ी की अष्टधातु की मूर्तियों का निर्माण किया। चार मूर्तियों पर खुदे नाम से निर्विवाद है कि गुग्गा ही मूर्तिकार था। साथ-साथ शायद वह वास्तुकला में भी सिद्धहस्त हो और भवन और मूर्ति निर्माण उसी ने किया हो।
छतराड़ी में हर वर्ष मणिमहेश यात्रा के दूसरे दिन से लगातार तीन दिन मेला होता है जिसमें पूजा, लोकनृत्य तथा अन्य सांस्कृतिक आयोजन होते हैं।

