
पांच साल से योजना को अमलीजामा पहनाने के लिए कसरत तो खूब हुई; पर एक भी पशु को नहीं मिला ठिकाना, कमेटी के समक्ष समस्याओं का अंबार
नगरोटा बगवां – राजीव जस्वाल
नगरोटा बगवां की सडक़ों पर बेसहारा घूम रहे पशुओं को आश्रय देने की वर्षों पुरानी योजना को अमलीजामा पहनाने हेतु गत पांच वर्षों में कसरत तो खूब हुई, लेकिन आज भी एकमात्र पशु को आश्रय नहीं मिल पाया। दूसरी ओर किसानों की समस्या आज भी जस की तस बनी हुई है, जबकि गोसदन के नाम पर अब तक 50 लाख की रकम खर्च की जा चुकी है ।
एक बृहद योजना के तहत नगरोटा बगवां के मटियारी में 52 कनाल भूमि में सरकार के प्रयासों से माता नारदा-शारदा गो सेवा सदन के नाम से एक जरुरी ढांचा तो बनकर तैयार हो गया, जिसका विधिवत सरकार के करकमलों से लोकार्पण भी हुआ, लेकिन अपने नाम को सार्थक करने में आज भी नाकाम है ।
हालांकि इसके निर्माण के लिए एक आधिकारिक कमेटी का गठन 2019 में हो गया था, जिसकी देखरेख में लोक निर्माण विभाग ने प्रारूप के तहत 50 लाख खर्च कर मूलभूत ढांचा भी बना दिया, लेकिन अब गोसदन को शुरू करने के लिए कमेटी के समक्ष एक नहीं कई समस्याएं मुंह बाएं खड़ी हो गई हैं।
जिस कारण गोसदन को शुरू करना टेढ़ी खीर साबित हो रहा है । जानकारी के मुताबिक प्रशासन को तलाश है किसी ऐसी समाजसेवी संस्था अथवा लोकसेवी समूह की जो उक्त गोसदन को सुचारू रूप से चलाने का दायित्व संभाले ।
सूत्र बताते है कि उक्त सदन में केवल 60 पशुओं को रखने की क्षमता है, जबकि पुष्ट विभागीय आंकड़ों के मुताबिक दिसंबर 2022 तक समीपवर्ती डेढ़ दर्जन पंचायत क्षेत्रों में ही आवारा पशुओं की संख्या 319 से भी अधिक है, जबकि समूचे उपमंडल में यह आंकड़ा हजारों में है ।
ऐसे में गोसदन का लाभ आकांक्षाओं के अनुरूप कितने क्षेत्र को मिल पाएगा, संदिग्ध बना हुआ है । सरकारी मानकों के अनुरूप एक गाय को आश्रय देने के लिए न्यूनतम 3 हजार की मासिक राशि चारे के रूप में जरूरी है, जबकि उक्त क्षमता के आधार पर कुल मासिक खर्चा तीन लाख अनुमानित हैं ।
ऐसे में स्थानीय दानी सज्जनों के सहयोग के बिना गोसदन का संचालन मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है । यही वजह है कि अभी तक कोई भी संस्था अथवा संस्थान संचालन के लिए आगे नहीं आया है और न ही योजनानुसार उन पशुओं को आश्रय मिल पाया है, जो आज भी सडकों पर रह कर किसानों और वाहन चालकों के लिए मुसीबत बने हुए हैं ।
पशु विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि गोसदन परिसर में अभी कई खामियां हैं, जिसमे सुधार की गुंजाइश है। ऐसे में पशुओं को मौजूदा हालात में यहां रखना खतरे से खाली नहीं है, जबकि बजट शून्य है और निर्माण कार्य भी ठप।
