हिमाचल बनेगा ट्वॉय मैन्युफेक्चरिंग हब, बिलासपुर में 41 बीघा जमीन पर लगेगी प्रदेश की पहली इंडस्ट्री

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मेड इन इंडिया पर केंद्र सरकार का फोकस, अब बिकेंगे लकड़ी, प्लास्टिक के खिलौने

बिलासपुर – सुभाष चंदेल 

अब हिमाचल प्रदेश में चाईनीज नहीं बल्कि देसी खिलौने पर्यटक स्थलों व शहरों की शोभा बनेंगे। लकड़ी, प्लास्टिक व अन्य तरह के खिलौने तैयार करने के लिए प्रदेश का पहला ट्वॉय मैन्युफेक्चरिंग कलस्टर आधारित प्रोजेक्ट जिला बिलासपुर के पंजगाईं में स्थापित करने के लिए कवायद शुरू हो चुकी है।

पंजगाईं में चयनित की गई 41 बीघा जमीन पर ट्रेनिंग एवं मैन्युफेक्चरिंग का एक बड़ा हब बनेगा जहां 15 से 20 कलस्टर होंगे और हर कलस्टर के लिए एक प्लॉट उपलब्ध होगा। जिस जिला को कलस्टर अलॉट होगा वहां संबंधित जिला के नामी खिलौनों की मैन्युफेक्चरिंग की जाएगी।

चाईनीज माल पर प्रतिबंधों के बाद केंद्र सरकार का फोकस अब मेड इन इंडिया पर है और इसी कड़ी में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के प्रयासों से प्रदेश का यह पहला प्रोजेक्ट बिलासपुर में धरातल पर उतरने जा रहा है।

पंजगाईं ग्राम पंचायत के उपप्रधान रवि कुमार बताते हैं कि पंजगाईं में काफी सरकारी जमीन उपलब्ध है जहां सरकार ने इस प्रोजेक्ट को स्थापित करने की योजना पर काम शुरू किया है।

इस प्रोजेक्ट के लगने से स्थानीय लोगों के लिए प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष तौर पर रोजगार के अवसर भी सृजित होंगे। योजना के तहत पंद्रह से बीस कलस्टर बनाए जाएंगे और सभी कलस्टर अलग-अलग तरह के खिलौने तैयार करेंगे जिनकी मार्केटिंग देश व प्रदेश भर में की जाएगी।

योजना का प्रारूप

कलस्टर आधारित परियोजना में 15 से 20 कलस्टर बनेंगे, जिला वार कलस्टर के लिए एक प्लॉट होगा अलॉट जहां उस जिला के नामी खिलौनों की मैनुफैक्चरिंग होगी, एक बड़ा ट्रेनिंग सेंटर बनेगा जहां प्रदेश भर के इच्छुक लोगों को खिलौने तैयार करने की ट्रेनिंग दी जाएगी।

प्लास्टिक-लकड़ी व अन्य तरह के खिलौने तैयार कर पर्यटक स्थलों की शोभा बनेंगे, प्रोजेक्ट लगने से प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष तौर पर सृजित होंगे रोजगार व स्वरोजगार के अवसरभी मिलेंगे।

राजेंद्र कुमार, महाप्रबंधक उद्योग विभाग बिलासपुर के बोल

बिलासपुर जिला के पंजगाईं में केंद्र वित्त पोषित ट्वॉय मैन्युफेक्चरिंग कलस्टर स्थापित करने की योजना पर काम शुरू कर दिया गया है।

एक निजी एजेंसी के जरिए एफसीए केस तैयार करवाया जा रहा है। महीने भर में यह कार्य पूरा होगा जिसके बाद केस स्वीकृति के लिए वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को प्रेषित किया जाएगा

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