कांगड़ा को तोडऩे के कयास से लोग नाराज, नए जिलों के नाम पर सियासी अस्तित्व को मिटाने के हो रहे प्रयास

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काँगड़ा- राजीव जस्वाल

प्रदेश के सबसे बड़े जिला कांगड़ा को तोड़कर छोटे जिले बनाने की चर्चाओं के बीच जनता में उबाल है। बड़े जिले के सियासी अस्त्तिव को मिटाने के लिए पहले भी प्रयास होते रहे हैं। इस बार भी शुरू हुए कयासों से जनता में गुस्सा है। कांगड़ा प्रदेश का सबसे बड़ा जिला है और इसके राजनीतिक वजूद के चलते प्रदेश के अन्य जिलों के नेताओं को चिंता रहती है। कांगड़ा के साथ चंबा भी सटा होने के कारण इसका बल अधिक बढ़ जाता है।

ऐसे में अकसर कांगड़ा को तोड़कर पालमपुर, देहरा और नूरपुर जिले बनाने का राग छेड़ा जाता है। कुछ नेता अपनी सियासी जमीन बचाने के लिए नए जिलों का राग छेड़ कर जनता को अपने पक्ष में करने का दांव चलते हैं, लेकिन बदले परिवेश में यह दांव उनके लिए उलटा पड़ सकता है। क्षेत्र के बुद्धिजीवी और शिक्षित समाज ऐसे निर्णयों का हर बार विरोध करता है। यही वजह है कि कांगड़ा को तोडऩे के कयासों के बाद प्रदेश के जिलों के पुनर्गठन की बात की जा रही है। इससे छोटे जिलों को बड़ा किया जा सके और जिला मुख्यालय से दूर बसे लोगों को भी नजदीक लगते जिले में मिलाकर सही स्थान मिल सके।

कांगड़ा ही क्यों, सभी जिलों का पुनर्गठन किया जाए

लोगों का मत है कि नए जिले बनाने भी हैं, तो प्रदेश के सभी जिलों का पुनर्गठन किया जाए। अकेले कांगड़ा को तोडऩे की योजना सही नहीं है। यदि कांगड़ा को सियासी टुकड़ों में बांटकर प्रदेश सरकार अपने हित साधती है, तो यहां उसे बड़े स्तर पर विरोध झेलना पड़ सकता है। यह भी तर्क दिया जा रहा है कि हर विधानसभा क्षेत्र स्तर पर एसडीएम ऑफिस खोल कर स्थानीय स्तर पर सुविधा मुहैया करवाई जा रही है। ऐसे में कांगड़ा को तोडऩा सही निर्णय नहीं होगा। इस मामले पर लोग बिना किसी सरकारी ऐलान के ही लामबंद होने शुरू हो गए हैं और इसे सरकार द्वारा कांगड़ा के लिए कुछ बड़ा न कर पाने के एवज में लिया जाने वाला निर्णय माना जा रहा है।

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