शाहपुर – नितिश पठानियां
साल 2026 का दूसरा और अंतिम चंद्रग्रहण 28 अगस्त 2026, शुक्रवार को लगेगा। यह ग्रहण 28 अगस्त को सुबह 6:53 बजे शुरू होकर दोपहर 12:31 बजे तक प्रभावी होगा। यह ग्रहण दुनिया के कई हिस्सों में दिखेगा लेकिन, भारत में यह चंद्रग्रहण नजर नहीं आएगा।
शाहपुर के ज्योतिषी आचार्य अमित कुमार शर्मा ने बताया कि ग्रहण के समय चंद्रमा अपने परम शत्रु शनि की राशि कुंभ और दूसरे कट्टर शत्रु राहु के शतभिषा नक्षत्र में विराजमान रहेंगे। शनि और राहु के इस दोहरे प्रभाव के कारण चंद्रमा पूरी तरह से उनके मायाजाल में उलझे रहेंगे, जिसका प्रतिकूल असर मानव जीवन और देश-दुनिया पर देखने को मिलेगा।
चंद्रमा के शनि और राहु के प्रभाव में रहने से आम जनमानस को कई मोर्चों पर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। लोगों में मानसिक तनाव, घबराहट और नकारात्मक विचारों की अधिकता रहेगी। सीने से जुड़े रोग और फेफड़ों से संबंधी परेशानियां बढ़ सकती हैं।
माता के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। गृह-कलह, रिश्तों में गलतफहमी और आपसी मतभेद बढ़ने की आशंका है। भूमि, भवन और वाहन से जुड़ी समस्याएं सामने आ सकती हैं।
इन 4 राशियों के लिए अत्यंत प्रतिकूल रहेगा समय
कर्क राशि – चंद्रमा आपकी राशि के स्वामी हैं, इसलिए सेहत पर सीधा असर पड़ेगा। सिरदर्द, आंखों की समस्या और ब्लड प्रेशर बढ़ने की शिकायत हो सकती है। आर्थिक नुकसान के योग हैं, अतः निवेश और लेन-देन से बचें। गलत संगति और नकारात्मकता से दूरी बनाएं।
सिंह राशि – अनियंत्रित खर्चों के कारण मानसिक तनाव बढ़ेगा। वाणी पर संयम न रखने से अपनों से रिश्ते बिगड़ सकते हैं और घर में कलह हो सकती है। कार्यक्षेत्र में काम का बोझ और दबाव अधिक रहेगा।
वृश्चिक राशि – शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में उतार-चढ़ाव बना रहेगा। जीवनसाथी और बच्चों की सेहत की चिंता सता सकती है। पैसों से जुड़ा कोई भी फैसला जल्दबाजी में न लें और कार्यस्थल पर संभलकर काम करें।
मीन राशि – इस दौरान कोई बड़ा निर्णय लेने से बचें। धन के लेन-देन या निवेश में फंसने की पूरी संभावना है। कार्यक्षेत्र में बाधाएं आएंगी और सफलता के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ेगा। क्रोध पर नियंत्रण रखें और विवादों से दूर रहें।
क्यों चंद्रमा को डंसते हैं राहु-केतु?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान स्वरभानु नामक दैत्य ने रूप बदलकर छल से अमृत पान कर लिया था। सूर्य और चंद्रमा ने उसकी इस चालाकी को पहचानकर भगवान विष्णु को बता दिया। तब भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। सिर ‘राहु’ और धड़ ‘केतु’ कहलाया। इसी दुश्मनी के कारण राहु और केतु पूर्णिमा के दिन चंद्रमा को निगलने का प्रयास करते हैं, जिसे चंद्र ग्रहण कहा जाता है।
सूतक काल और धार्मिक मान्यताएं
धार्मिक और शास्त्र सम्मत मान्यताओं के अनुसार, ग्रहण का सूतक काल केवल उसी स्थान पर मान्य होता है जहां वह प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देता है। चूंकि, ये दोनों ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देंगे, इसलिए यहां भारत में सूतक काल लागू नहीं होगा। पूजा-पाठ, मंदिर के दर्शन और दैनिक शुभ कार्यों पर कोई रोक-टोक नहीं रहेगी। लोग बिना किसी भय या पाबंदी के अपनी सामान्य दिनचर्या जारी रख सकते हैं।
नोट: ज्योतिष में बताए गए राशि प्रभाव धार्मिक/ज्योतिषीय मान्यताओं पर आधारित हैं, वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित प्रभाव नहीं।

