हिमाचल के पारंपरिक खानपान में ‘पचोले’ की अपनी खास पहचान है, यह व्यंजन केवल स्वाद तक सीमित नहीं, बल्कि पहाड़ की संस्कृति, परंपरा और खानपान की विरासत से भी जुड़ा हुआ है।
शाहपुर – नितिश पठानियां
हिमाचल प्रदेश की समृद्ध खान-पान परंपरा में यहां के पारंपरिक व्यंजनों का अपना अलग महत्व है। जिला सोलन के पारंपरिक व्यंजनों में ‘पचोले’ भी शामिल है। मकई से तैयार किया जाने वाला यह पारंपरिक पहाड़ी व्यंजन विशेष रूप से सोलन, सिरमौर और शिमला के कुछ क्षेत्रों में मानसून और त्योहारों के दौरान बनाया जाता है।
बदलते दौर में जहां आधुनिक खान-पान लोगों की पसंद बनता जा रहा है, वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी पचोले जैसे पारंपरिक व्यंजन स्थानीय संस्कृति और खान-पान की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।
धारों की धार निवासी संतोष ठाकुर ने बताया कि पचोले को मुख्य रूप से ताजे मकई के दानों को पीसकर तैयार किया जाता है। इसमें स्थानीय स्वाद के अनुसार अजवाइन, सौंफ, हरी मिर्च, अदरक और अन्य पहाड़ी मसाले मिलाए जाते हैं।
मकई के तैयार पेस्ट को अच्छी तरह मिलाकर गाढ़ा मिश्रण बनाया जाता है। इसके बाद इसे हल्दी के पत्तों या उपलब्धता के अनुसार अन्य पत्तों पर फैलाकर भाप में पकाया जाता है। पारंपरिक तरीके से तैयार होने के कारण इसमें मकई और पहाड़ी मसालों का खास स्वाद महसूस होता है।
उन्होंने बताया कि पचोले बनाने के लिए ताजा और नरम मकई का इस्तेमाल किया जाता है। पहाड़ी क्षेत्रों में मकई की फसल आने के समय इसे घरों में बनाने की परंपरा रही है। कई परिवार इसे त्योहारों, विशेष अवसरों और मेहमानों के लिए भी तैयार करते हैं।
पहले ग्रामीण क्षेत्रों में जब बाजार से मिलने वाले व्यंजनों और पैकेज्ड खाद्य पदार्थों का चलन कम था, उस समय पचोले जैसे व्यंजन घर के भोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा हुआ करते थे।
कैसे पकाएं पचोले
पचोले को भाप में पकाने के बाद इसे पत्तों से अलग किया जाता है। इसके बाद गर्मागर्म पचोले को देसी घी या पारंपरिक पहाड़ी चटनी के साथ परोसा जाता है। स्थानीय लोगों के अनुसार देसी घी और चटनी के साथ इसका स्वाद और भी बढ़ जाता है। इसकी खासियत यह है कि इसमें इस्तेमाल होने वाली अधिकांश सामग्री स्थानीय स्तर पर आसानी से उपलब्ध हो जाती है।
सिर्फ व्यंजन नहीं हिमाचल की विरासत
संतोष ठाकुर के अनुसार पचोले केवल एक व्यंजन नहीं बल्कि पहाड़ी जीवनशैली और पारंपरिक खान-पान से जुड़ी एक विरासत है। नई पीढ़ी को ऐसे पारंपरिक व्यंजनों से जोडऩे की जरूरत है, ताकि स्थानीय खान-पान की यह पहचान आने वाली पीढिय़ों तक पहुंच सके।
सोलन सहित आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी कई परिवार पारंपरिक विधि से पचोले तैयार करते हैं। स्थानीय व्यंजनों को पर्यटन से जोडऩे की संभावनाओं के बीच पचोले जैसे पारंपरिक पकवान हिमाचली खान-पान को नई पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

