हिमखबर डेस्क
एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 3(1)(आर) के तहत किसी को दोषी ठहराने के लिए पीडि़त की जाति का ठोस और वैध प्रमाण होना जरूरी है। सिर्फ आरोप या सामान्य दावा पर्याप्त नहीं माना जाएगा। यह फैसला दिया छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने।
यह टिप्पणी न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास ने सुनवाई के दौरान की। मामला सरकारी जमीन पर दुकान बनाने को लेकर हुए विवाद से जुड़ा है। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि इस दौरान आरोपियों ने उसे जातिसूचक शब्द कहकर अपमानित किया, मारपीट की और जान से मारने की धमकी दी।
इसके आधार पर पुलिस ने आईपीसी की धाराएं 294, 323, 506/34 और एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(1)(आर) में एफआईआर दर्ज की थी। ट्रायल कोर्ट ने सुनवाई के बाद आरोपियों को आईपीसी की धारा 294, 506 और एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(1)(आर) के तहत दोषी ठहराया था।

आरोपियों ने उच्च न्यायालय में अपील करते हुए कहा कि शिकायतकर्ता का जाति प्रमाणपत्र केवल तहसीलदार द्वारा जारी अस्थायी दस्तावेज है, जिसे कानूनी रूप से वैध नहीं माना जा सकता। उच्च न्यायालय ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए कहा कि किसी भी व्यक्ति की जाति साबित करने के लिए सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी वैध प्रमाणपत्र जरूरी होता है।
इस मामले में ऐसा प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया, इसलिए एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(1)(आर) के तहत अपराध सिद्ध नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर इस धारा में दी गई सजा को रद्द कर दिया गया। अदालत ने गवाहों के बयानों को आधार मानते हुए आईपीसी की धारा 294 (अश्लील भाषा के उपयोग) के तहत दोषसिद्धि को कायम रखा।
वहीं, धारा 506(2) के तहत आपराधिक धमकी का आरोप पर्याप्त साक्ष्य के अभाव में खत्म कर दिया गया। न्यायालय ने यह भी माना कि घटना को 21 साल से ज्यादा समय बीत चुका है और आरोपी पहले ही एक दिन जेल में रह चुके हैं। ऐसे में छह महीने की सजा को घटाकर पहले से भुगती गई अवधि तक सीमित कर दिया गया। हालांकि, जुर्माना बढ़ाकर 500 से 2000 रुपए प्रति आरोपी कर दिया गया।

