स्वाद ऐसा कि VIP भी खिंचे चले आएं! बिना गैस-बिजली के लकड़ी के चूल्हे पर ये बुजुर्ग बनाती हैं लाजवाब मिठाइयां

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हिमखबर डेस्क

वैश्विक तनाव और महंगाई के इस दौर में जहां एक ओर रसोई गैस की किल्लत और बढ़ती कीमतों को लेकर हाहाकार मचा हुआ है, वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अपनी पारंपरिक कार्यशैली से समाज के लिए एक बड़ी प्रेरणा बन गए हैं। आपदा और विपरीत परिस्थितियों में खुद को कैसे आत्मनिर्भर बनाए रखना है, इसकी जीती-जागती मिसाल हैं 70 वर्षीय लीला देवी।

हमीरपुर जिले के टौणीदेवी स्थित अस्पताल चौक पर हलवाई की दुकान चलाने वाली लीला देवी (निवासी गांव टप्परे) आज भी 1960 के दशक की शुद्धता और स्वाद को लकड़ी के चूल्हे पर जिंदा रखे हुए हैं। जिस दौर में गैस के बिना ढाबे और रैस्टोरैंट ठप्प पड़ जाते हैं, लीला देवी की दुकान बिना गैस और बिना बिजली के, पूरी तरह से देसी अंदाज में चल रही है।

लीला देवी का सफर आसान नहीं रहा है। वर्ष 1960 से उनके पति स्वर्गीय सरवन सिंह यहां हलवाई की दुकान किया करते थे। पति के निधन के बाद इस विरासत को उनके बेटे राजकुमार (राजू) ने संभाला, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। बेटे की भी असमय मृत्यु हो गई। पति और जवान बेटे को खोने के बाद 70 वर्षीय लीला देवी ने हार नहीं मानी और खुद इस पुश्तैनी दुकान की कमान संभाल ली। आज वह अकेले ही पूरी दुकान चला रही हैं।

लीला देवी की दुकान की सबसे बड़ी खासियत यहां की पूर्णतः स्वदेशी कार्यशैली है। आज भी यहां कोई भी मिठाई गैस या स्टोव पर नहीं बनती। लीला देवी खुद चने की दाल पीसकर ताजा बेसन तैयार करती हैं और फिर लकड़ी के चूल्हे पर स्वादिष्ट बेसन की बर्फी, मट्ठी और शक्करपारे बनाती हैं। पुराने समय में उनके पति के हाथ की मट्ठी और शक्करपारे खाने लोग दूर-दूर से आते थे। आज भी स्थानीय बुजुर्ग सुबह की चाय घर पर पीने के बजाय लीला देवी की दुकान पर पीना पसंद करते हैं, क्योंकि यहां चाय आज भी पीतल के बर्तन में और लकड़ी की आंच पर कड़क बनाई जाती है।

इस देसी स्वाद का जादू ऐसा है कि आम जनता ही नहीं, बल्कि कई दिग्गज नेता भी इसके दीवाने रहे हैं। स्थानीय दुकानदारों अजीत चौहान, विजय बहल और विपिन शर्मा ने बताया कि लीला देवी की दुकान पर बनने वाले शुद्ध देसी बेसन और मट्ठी का स्वाद इतना लाजवाब है कि पूर्व मुख्यमंत्री प्रो. प्रेम कुमार धूमल, पूर्व विधायक डॉ. लश्करी राम राठौर और पूर्व विधायक कर्म सिंह ठाकुर सहित कई वीआईपी लोग यहां की मिठाइयों को बेहद पसंद करते रहे हैं।

गैस संकट पर बात करते हुए लीला देवी बड़ी सादगी से कहती हैं कि आज लोग गैस के लिए परेशान हैं, लेकिन हमने कभी कोई मिठाई गैस या स्टोव पर नहीं बनाई। थोड़ी सी लकड़ियों से चूल्हे पर बेहतरीन मिठाइयां तैयार हो जाती हैं। हमारी दुकान में तो बिजली (लाइट) भी नहीं है, फिर भी लोग हमारी चाय, बेसन, मट्ठी और शक्करपारे इतना पसंद करते हैं। इसके लिए मैं भगवान की शुक्रगुजार हूं।

आधुनिकता की अंधी दौड़ और संसाधनों के रोने के बीच 70 वर्षीय लीला देवी का लकड़ी के चूल्हे के सामने बैठकर मुस्कुराते हुए काम करना, हम सभी के लिए स्वरोजगार और स्वावलंबन का एक बहुत बड़ा सबक है।

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