हिमखबर डेस्क
हिमाचल प्रदेश में पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव में जिला परिषद के लिए निर्विरोध निर्वाचन का सपना अधूरा रह गया है। हालांकि प्रदेश सरकार द्वारा निर्विरोध जिला परिषद सदस्य चुनने के लिए एक करोड़ रुपए देने की घोषणा भी इस चुनाव में काम नहीं कर सकी।
सरकार ने वर्षों बाद प्रोत्साहन राशि में ऐतिहासिक बढ़ोतरी करते हुए जिला परिषद के पूर्ण निर्विरोध गठन पर मिलने वाली राशि को 15 लाख रुपए से बढ़ाकर सीधे 1 करोड़ रुपए कर दिया है।
ऐसे में यह उम्मीद जताई जा रही थी कि प्रदेश में आर्थिक प्रोत्साहन लोकतांत्रिक सहमति को बढ़ावा देगा और गांवों से लेकर जिला स्तर तक निर्विरोध चुनावों की एक नई मिसाल कायम होगी, लेकिन नतीजे अपेक्षाओं के बिल्कुल उलट सामने आए हैं।
प्रदेश भर की 251 जिला परिषद सीटों में से एक भी जिला परिषद वार्ड सदस्य निर्विरोध नहीं चुना गया, वहीं पंचायत समितियों में भी प्रदेश के 91 विकास खंडों में किसी भी पंचायत समिति का पूरा गठन निर्विरोध नहीं हुआ है।
जिस कारण इस बार किसी भी विकास खंड को 50 लाख रुपए की प्रोत्साहन राशि नहीं मिलेगी। हालांकि पंचायत समिति स्तर पर 85 सदस्य निर्विरोध जरूर चुने गए हैं, लेकिन नियमों के मुताबिक पुरस्कार तभी मिलता है, जब संबंधित विकास खंड के अंतर्गत पूरी पंचायत समिति, उसके सभी सदस्य, अध्यक्ष और उपाध्यक्ष निर्विरोध निर्वाचित हों।
ऐसे में व्यक्तिगत स्तर पर निर्विरोध जीत दर्ज होने के बावजूद कोई भी पंचायत समिति इनाम की पात्र नहीं बन सकी। हालांकि ग्रामीण सरकार स्तर पर सरकार की यह नीति कुछ हद तक सफल रही है।
प्रदेश में इस बार 131 पंचायतें पूरी तरह निर्विरोध चुनी गई हैं, जिन्हें सरकार की ओर से कुल 32.75 करोड़ रुपए की प्रोत्साहन राशि जारी की जाएगी।
पंचायत स्तर पर निर्विरोध चुनावों को लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में सहमति और सामाजिक संतुलन देखने को मिला, लेकिन उच्च स्तर की पंचायतीराज संस्थाओं में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और स्थानीय समीकरण भारी पड़ गए।

