15 विधायकों वाले जिला को साढ़े तीन दशकों से न मिला सीएम, न पार्टी अध्यक्ष
हिमखबर डेस्क
राजनीतिक तौर पर कांगडा हिमाचल का सबसे बड़ा जिला है। इस बड़े जिले से 15 विधायक हिमाचल विधानसभा के लिए निर्वाचित होते हैं। लेकिन राजनीतिक पकड़ में जिला कांगड़ा करीब साढ़े तीन दशकों से कमजोर दिखाई दे रहा है। क्षेत्रीय असंतुलन और कांगड़ा की राजनैतिक तौर पर अनदेखी के स्वर समय-समय पर सुनने को मिलते हैं।
लेकिन हिमाचल की राजनीति का विश्लेषणात्मक अध्ययन करें तो शांता कुमार को छोडक़र न तो यहां से कोई मुख्यमंत्री बन सका है और न ही पार्टी अध्यक्ष। अब 35 वर्ष से अधिक का समय हो गया है, लेकिन कांगड़ा जिला मुख्यमंत्री पद और भाजपा के अध्यक्ष पद की दौड़ से बाहर है।
शिमला जिला जो तीसरे नंबर का जिला है, उसने दो मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह और ठाकुर रामलाल दिए और सिरमौर से हिमाचल प्रदेश के निर्माता माने जाने वाले डॉक्टर वाई एस परमार मुख्यमंत्री रहे हैं। हमीरपुर से वर्तमान में मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू हंै और इससे पहले प्रेम कुमार धूमल दो बार मुख्यमंत्री रह चुके हैं और उनकी विधानसभा में हार के चलते अवसर मंडी को मिला और प्रदेश की राजनीति में 10 विधायकों वाले दूसरे नंबर के जिले से जय राम ठाकुर मुख्यमंत्री बने।
बारीकी से अवलोकन किया जाए तो इसमें कोई दो राय नहीं कि पूर्व सीएम शांता कुमार को यह पद उनके व्यक्तित्व के कारण हासिल हुए थे न कि बड़े जिले का प्रतिनिधित्व करने के कारण। वह आज से 35 वर्ष पूर्व भाजपा के अध्यक्ष थे, जो कांगडा जिला से संबंध रखते थे।
जिला मंडी, ऊना, सिरमौर से दो-दो नेता भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं। सोलन, शिमला, बिलासपुर और कुल्लू से भी एक- एक नेता प्रदेश अध्यक्ष बन चुके हैं। ऐसी ही हालत कांग्रेस की है। कांग्रेस के नेता भी कांगड़ा का सरकार में मुखिया या पार्टी अध्यक्ष के तौर पर प्रतिनिधत्व नहीं कर पाए हैं।
अध्यक्ष के लिए दोनों पार्टियां कर रहीं कसरत
इस बात का जिक्र करना इसलिए भी आवश्यक है कि अभी भाजपा और कांग्रेस दोनों ही राजनीतिक दलों ने अपने प्रदेश अध्यक्ष का चुनाव करना है। ऐसे में कांगड़ा जिला को प्रतिनिधित्व का मौका मिलता है तो यह कांगड़ा के लिए बड़े सम्मान की बात होगी। अभी दोनों ही राजनीतिक दल प्रदेश अध्यक्ष के चुनाव को गुणा भाग कर रहे हैं, जिसमें कई नेताओं के नाम भी चर्चा में आ रहे हैं।

