हिमखबर डेस्क
हिमाचल प्रदेश में लोकसभा चुनाव-2024 के लिए नामांकन का दौर चल रहा है। नामांकन पत्रों की छंटनी 15 मई को होगी और 17 मई तक नामांकन वापस लिए जा सकेंगे। पहली जून को चार सीटों पर लोकसभा चुनाव और छह सीटों पर विधानसभा उपचुनाव होंगे।
17 मई के बाद भाजपा और कांग्रेस के राष्ट्रीय नेता चुनाव प्रचार के लिए देवभूमि का रुख करेंगे। इस बार हिमाचल के वोटरों के सियासी मिजाज पर सबकी नजरें रहेंगी। भाजपा के सामने लोकसभा चुनाव में क्लीन स्वीप की हैट्रिक लगाने की चुनौती रहेगी। वहीं, कांग्रेस एक दशक से मिल रही करारी हार का क्रम तोड़ने की कवायद करेगी।
हिमाचल के वोटर सियासत की पिच पर बड़े-बड़े राजनीतिक सूरमाओं को पटखनी दे चुके हैं। सूबे के तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों स्वर्गीय वीरभद्र सिंह, शांता कुमार और प्रेम कुमार धूमल तक को चुनाव में हार का सामना करना पड़ा है।
इसके अलावा दिग्गज नेताओं भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा, कांग्रेस की वरिष्ठ नेत्री व पूर्व मंत्री विद्या स्टोक्स, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रतिभा सिंह, पर्व मंत्री कौल सिंह ठाकुर, स्वर्गीय जीएस बाली, गुलाब सिंह ठाकुर इत्यादि को भी यहां के वोटर चुनाव के समय दिन में तारे दिखा चुके हैं।
महज चार लोकसभा सीटों वाला हिमाचल बेशक छोटे राज्यों में शुमार है, लेकिन यहां की राजनीति का दायरा राष्ट्रव्यापी है। मौसम की तरह ही यहां के राजनेताओं का मिजाज और जनता का मत भांपना मुश्किल माना जाता है। यही वजह है कि राजनीति के सूरमाओं को भी हिमाचल की धरती में अप्रत्याशित हार का सामना करना पड़ा है।
हिमाचल में ऐसे दर्जनों दिग्गज हैं, जिनका इतिहास में करारी शिकस्त से सामना हुआ है। हिमाचल में दिग्गजों की हार का ज्यादा उलटफेर विधानसभा चुनाव में हुआ है। लोकसभा चुनाव में बड़े नेताओं की हार की बात करें, तो धूमल, शांता, वीरभद्र सिंह और प्रतिभा सिंह को हार का सामना करना पड़ा था।
लोकसभा सीटों पर मतदाता न तो राजनेताओं के कद से प्रभावित हुए हैं और न ही मतदान करते वक्त उन्होंने उनके पद की चिंता की है। मतदाताओं ने पसंद आने पर एक ही राजनेता को कई बार मौका दिया है, तो नापसंद होने पर बड़े-बड़े धुरंधरों को भी हार दिलवा दी।
हिमाचल के मतदाताओं का चौंकाने वाले नतीजा देने का पुराना और लंबा इतिहास रहा है। यहां मतदाता कभी जिस नेता को सर आंखों पर बैठते हैं, अगले ही पल उसको हार का स्वाद चखाने में देरी नहीं करते।
धूमल को मिली थी लोकसभा और विधानसभा चुनाव में हार
पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल ने पहला लोकसभा चुनाव 1984 में हमीरपुर से लड़ा था। उस समय कांग्रेस के वर्चस्व के चलते धूमल की हार हुई थी। हालांकि, इसके बाद अगले दो लोकसभा चुनाव में जीत से उनका सियासी कद बढ़ गया। वर्ष 1996 में धूमल को कांग्रेस के मेजर जनरल बिक्रम जीत ने शिकस्त दी थी।
इसके बाद धूमल ने प्रदेश की सियासत का रूख किया और लगातार चार बार विधायक का चुनाव जीता। वह दो बार प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के राजेंद्र राणा ने धूमल को पटखनी देकर सियासी सनसनी मचा दी। उस समय धूमल को भाजपा ने मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित किया था।
छह बार सीएम रहे वीरभद्र को भी मिली थी हार
हिमाचल की सियासत का बड़ा चेहरा रहे कांग्रेस के कदावर नेता व छह बार सीएम रहे वीरभद्र सिंह को भी विधानसभा चुनाव में हार का मुंह देखना पड़ा था। 1990 में जब वीरभद्र सिंह ने रोहड़ू और जुब्बल कोटखाई दो स्थानों से चुनाव लड़ा। रोहड़ू से तो वीरभद्र सिंह जीत गए, किंतु पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय ठाकुर राम लाल ने उन्हें जुब्बल कोटखाई से हरा दिया।
यह वही राम लाल हैं, जो वीरभद्र सिंह से पहले हिमाचल के मुख्यमंत्री थे। कांग्रेस ने ठाकुर राम लाल की जगह वीरभद्र सिंह को मुख्यमंत्री बनाया था। ठाकुर राम लाल ने 1990 का चुनाव जनता दल के टिकट पर लड़ा था। इससे पहले वीरभद्र सिंह को 1977 में मंडी संसदीय क्षेत्र से 35 हजार 505 वोटों की बड़ी हार झेलनी पड़ी थी। उन्हें बीएलडी के नेता गंगा सिंह ने इस चुनाव में हराया था।
अंत्योदय योजना लाने वाले शांता कुमार भी हारे चुनाव….
अंत्योदय योजना लाने वाले व दो बार मुख्यमंत्री रहे शांता कुमार 1993 में विधानसभा का चुनाव हार चुके हैं। कांग्रेस के एक साधारण कार्यकर्ता मान चंद राणा ने उन्हें शिकस्त दी थी। इसके बाद 1996 और 2004 के लोकसभा चुनाव में उन्हें कांगड़ा लोकसभा सीट पर हार मिली।
1996 के लोकसभा चुनाव में शांता कुमार 37 हजार 524 वोटों से चुनाव हारे थे। उन्हें कांग्रेस के सत महाजन से यह हार मिली थी। शांता कुमार राजनीतिक पारी में दूसरा आम चुनाव 2004 में हारे। इस चुनाव में उनके सामने मौजूदा कृषि मंत्री चंद्र कुमार मैदान में थे। चंद्र कुमार ने शांता कुमार को 17 हजार 791 मतों के अंतर से हराया था।
वीरभद्र सिंह की पत्नी प्रतिभा सिंह को मिली दो बार हार
वीरभद्र सिंह की पत्नी प्रतिभा सिंह भी हारे दिग्गजों की सूची में शामिल हैं। उन्हें दो बार लोकसभा चुनाव में हार का सामना करना पड़ा है। 1998 के लोकसभा चुनाव में प्रतिभा सिंह को भाजपा के महेश्वर सिंह ने एक लाख 31 हजार 832 मतों के अंतर से हराया था।
इसके बाद 2014 में जब देश में मोदी लहर चल रही थी, तो इस लहर में कांग्रेस की उम्मीदवार प्रतिभा सिंह लोकसभा सीट नहीं बचा पाई और भाजपा के रामस्वरूप शर्मा ने प्रतिभा सिंह को करीब 40 हजार वोटों से शिकस्त दी। हालांकि वर्ष 2021 में मंडी सीट पर हुए उपचुनाव में प्रतिभा सिंह ने भाजपा के खुशाल ठाकुर को मात देकर एक बार फिर यह सीट कांग्रेस की झोली में डाली। इस बार मंडी सीट पर प्रतिभा सिंह का बेटा विक्रमादित्य सिंह चुनाव मैदान में है।
जेपी नड्डा समेत अन्य दिग्गजों को भी देखना पड़ा हार का मुंह
इनके अलावा भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा को भी एक बार विधानसभा चुनाव में हार का सामना करना पड़ा है। वर्ष 2003 बिलासपुर सीट पर कांग्रेस के तिलक राज ने नड्डा को हराया था। प्रदेश में कई अन्य वरिष्ठ एवं दिग्गज मंत्री व नेता भी चुनावों में हार का सामना कर चुके हैं।
हार का सामना करने वाले दिग्गज नेताओं की सूची में पूर्व मंत्री कौल सिंह ठाकुर, गुलाब सिंह ठाकुर, दिवंगत जीएस बाली और रविंदर रवि भी शामिल हैं। प्रदेश की राजनीति व कांग्रेस में दिल्ली तक पैठ रखने वाली विद्या स्टोक्स भी हार चुकी हैं। एक समय विद्या स्टोक्स कांग्रेस में खुद में एक धड़ा थी, लेकिन चुनाव में जनता ने उन्हें भी वोट की चोट दी है।
लोकसभा चुनाव में स्वास्थ्य मंत्री कर्नल धनी राम शांडिल 2009 और 2019, कृषि मंत्री चंद्र कुमार को 2009 और 2014 में हार का सामना करना पड़ा था।

