
शिमला – नितिश पठानियां
हिमाचल की होनहार बेटी बलजीत कौर को मदद की दरकार है. पर्वतारोहण में कई कीर्तिमान स्थापित करने वाली सोलन जिले की रहने वाली 27 वर्षीय बलजीत का सपना है कि वो अब दुनिया की सबसे उंची चोटी एवरेस्ट को फतह करना चाहती है, वो भी बिना ऑक्सीजन स्पोर्ट के.
हालांकि, इससे पहले वो माउंट एवरेस्ट को फतेह कर चुकी है, लेकिन इस बार 8,848.86 मीटर इस चोटी को विदऑउट ऑक्सीजन फतेह करना चाहती है लेकिन आर्थिक तंगी आड़े आ रही है. इस अभियान को पूरा करने के लिए 35 लाख रुपये से ज्यादा का खर्च आएगा.
इससे पहले कुछ अभियानों को पूरा करने के लिए पूर्व सरकार ने 3 लाख रुपये की मदद जरूर की थी, लेकिन वो जोखिम भरे पर्वतारोहण अभियानों को पूरा करने के लिए नाकाफी मदद थी. बलजीत कौर अब मदद के लिए खेल मंत्री विक्रमादित्य सिंह से गुहार लगाई है. विक्रमादित्य सिंह ने हरसंभव मदद का भरोसा दिया है.
बलजीत कौर का कहना है कि ये लड़ाई केवल वो अकेली नहीं लड़ रही, बल्कि ये लड़ाई उन सब होनहार प्रतिभाओं की है, जो इस क्षेत्र में आगे आना चाहते हैं और देश का नाम रोशन करना चाहते हैं.
बलजीत कौर के नाम 30 दिन में 8 हजार मीटर से ऊंची 5 चोटियां फतेह करने का रिकार्ड है. 2021 में नेपाल की 7161 मीटर ऊंची पुमोरी चोटी को फतेह करने वाली पहली भारतीय महिला बनी थी. बलजीत कौर ने 30 दिन के भीतर एक बाद एक 8 हजार मीटर से उंचे माउंट अन्नापूर्णा, माउंट कंचनजंगा, माउंट एवरेस्ट, माउंट ल्होत्से और माउंट मकालू को चोटियों को फतेह किया था.
माउंट मकालू को फतेह करने वाली भी बलजीत पहली भारतीय महिला बनीं थी. साल 2020 में दुनिया में सबसे ज्यादा चोटियां फतेह करने वाली 16 महिला पर्वतारोहियों में बलजीत कौर का नाम भी शामिल है.
बलजीत का कहना है कि इससे पहले भी कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा लेकिन कई बार अकेली ही भिड़ गई. क्राउड फंडिग का भी सहारा लिया, अब वो भी कितना किया जाए. बड़ी कंपनियां स्पोन्सर नहीं करती क्योंकि इतनी बड़ी एप्रोच नहीं है, जिन छोटी कंपनियों के पास जाएं तो वो कहती हैं सीएसआर के तहत मदद हो सकती है लेकिन पर्वतारोहण शामिल नहीं है.
बलजीत कौर ने सरकार से मांग की है कि अन्य राज्यों की तरह हिमाचल में भी पर्वतारोहण को समझा जाए, जिस तरह से अन्य साहसिक खेलों को प्रमोट किया जाता है, इसे प्रमोट किया जाए. बहुत से प्रतिभावान पर्वतारोही इस फील्ड को छोड़ रहे हैं, कारण सिर्फ एक है और वो है आर्थिक तंगहाली. उन्होंने अन्य एथलीटों से भी पर्वतारोहण को सपोर्ट करने की मांग की है.
बता दें कि बलजीत के पिता एचआरटीसी में ड्राइवर थे, जो 2003 में सेवानिवृत हो गए और अब खेती-बाड़ी करते हैं. पिता के काम में मां हाथ बटाती है, एक बहन है जो पोस्ट ग्रेजुएशन कर रही है और भाई 11वीं कक्षा में पढ़ाई कर रहा है.
