हिमखबर डेस्क
समय भले ही यादों को धुंधला कर दे, लेकिन मां की ममता कभी कमजोर नहीं पड़ती। 40 साल पहले लापता हुआ बेटा जब अचानक घर की चौखट पर लौटा, तो एक बूढ़ी मां की आंखों में ठहर गई उम्मीद आखिरकार आंसुओं के रूप में बह निकली। यह दृश्य सिर्फ एक परिवार का नहीं, बल्कि पूरे समाज को भावुक कर देने वाला था।
ग्राम पंचायत अपर बरोट के गांव जरल (फतेहपुर) में उस वक्त सन्नाटा छा गया, जब 55 वर्षीय राजू वर्षों बाद अपने घर पहुंचा। करीब 15 साल की उम्र में घर से अचानक गायब हुआ यह बच्चा अब उम्र के इस पड़ाव पर लौटकर आया था। परिजन तो उसे कब का खो चुके थे, लेकिन मां शंकरी देवी के दिल में कहीं न कहीं उम्मीद अभी भी जिंदा थी।

राजू ने बताया कि वह घर से निकलकर पुरानी दिल्ली पहुंच गया था, जहां उसने लाल किले के पास एक ढाबे में काम किया। लेकिन समय के साथ उसकी सेहत और मानसिक स्थिति बिगड़ती चली गई। हालात ऐसे बने कि वह सड़कों पर लावारिस जीवन जीने को मजबूर हो गया और अपनी पहचान तक भूल बैठा।
यहीं से शुरू होती है इंसानियत की एक मिसाल। श्रद्धा फाउंडेशन के प्रयासों ने इस बिछड़ी कहानी को फिर से जोड़ दिया। 23 मई 2024 को संस्था के कार्यकर्ताओं ने राजू को दिल्ली की सड़कों से रेस्क्यू किया। मनोचिकित्सकों की देखरेख में इलाज के बाद जब उसकी याददाश्त लौटी, तो उसने अपने गांव और परिवार का नाम बताया।
इस संस्था के संस्थापक डॉ. भरत वाटवानी, जिन्हें 2018 में रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है, वर्षों से ऐसे ही भटके हुए लोगों को उनके घर तक पहुंचाने का काम कर रहे हैं। अब तक 14,000 से अधिक जिंदगियां फिर से अपने परिवारों से जुड़ चुकी हैं।

जब राजू को गांव लाया गया, तो कुछ पल के लिए सब स्तब्ध रह गए। लेकिन 95 वर्षीय मां ने अपने बेटे को पहचानने में एक पल भी नहीं लगाया, बचपन में आंख पर लगे एक निशान और उसके स्वभाव ने मां के दिल को यकीन दिला दिया कि यह वही खोया हुआ लाल है। मां-बेटे का यह मिलन देखकर वहां मौजूद हर आंख नम हो गई।
भाइयों ने मिठाइयां बांटकर इस चमत्कारी वापसी का स्वागत किया और राजू की देखभाल की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ली। संस्था की ओर से उसका इलाज और दवाइयां भी निशुल्क जारी रहेंगी। यह सिर्फ एक परिवार के मिलन की कहानी नहीं, बल्कि यह विश्वास दिलाने वाली सच्चाई है कि अगर ममता सच्ची हो और कोशिशें ईमानदार, तो वक्त भी रिश्तों को नहीं तोड़ सकता।

