हिमखबर डेस्क
हिमाचल प्रदेश में ‘चिट्टा’ (हेरोइन) आज सबसे बड़ी सामाजिक और कानून-व्यवस्था की चुनौतियों में से एक बन चुका है। सीमावर्ती राज्यों से संचालित तस्करी के नेटवर्क ने प्रदेश के कई जिलों तक अपनी पहुंच बना ली है। सबसे अधिक चिंता इस बात की है कि इसकी गिरफ्त में बड़ी संख्या में युवा आ रहे हैं।
राज्य सरकार ने चिट्टा माफिया के खिलाफ आर्थिक, कानूनी और तकनीकी मोर्चे पर एक साथ कार्रवाई शुरू कर दी है। लेकिन इस सब के बीच सप्लाई चेन पूरी तरह से नहीं टूट पा रही है, इसकी वजह इनका नेटवर्क है।
तस्कर निजी वाहनों, टैक्सियों, बसों, कुरियर, फर्जी पहचान पत्र, मोबाइल सिम, डिजिटल भुगतान और बैंक खातों का इस्तेमाल करते हैं, ताकि पुलिस की नजर से बच सकें। सप्लायर से सब-सप्लायर और फिर स्थानीय पैडलर के माध्यम से यह नशा युवाओं तक पहुंचाया जाता है।
अधिकतर मामलों में लोकल पैडलर को माफिया के बारे में कोई जानकारी ही नहीं होती। यही कारण है पुलिस माफिया तक पहुंच ही नहीं पाती। एक पैडलर पकड़ा जाता है तो माफिया और नेटवर्क खड़ा कर दे रहा है, जिस कारण चिट्टा तस्करी का क्रम नहीं रुक रहा।
हिमाचल में चिट्टे (हेरोइन) की तस्करी का नेटवर्क लगातार अपना तरीका बदल रहा है। अब तक पुलिस और एसटीएफ की जांच में सामने आए मामलों के अनुसार तस्कर पड़ोसी राज्यों से छोटे-छोटे पैकेटों में खेप भेजते हैं, ताकि पकड़ में आने पर नुकसान कम हो।
कई मामलों में निजी कारों, टैक्सियों, एचआरटीसी व निजी बसों और बाइक के जरिए सप्लाई लाई गई। कुछ मामलों में महिला तस्करों और नशे के आदी युवाओं को ‘कैरियर’ बनाकर इस्तेमाल किया गया।
पुलिस जांच में मोबाइल, सोशल मीडिया, वाटसएप कॉल, फर्जी नामों से सिम, यूपीआई भुगतान और बैंक खातों के जरिये लेन-देन के प्रमाण भी मिले हैं।
पुलिस का कहना है कि तस्कर लगातार नए तरीके अपनाते हैं, इसलिए अब केवल बरामदगी ही नहीं, बल्कि डिजिटल ट्रेल, बैंक खातों, मोबाइल डेटा और संपत्ति की जांच पर भी विशेष फोकस किया जा रहा है, ताकि पूरे सप्लाई नेटवर्क को जड़ से तोड़ा जा सके।
इसी अवधि में ओवरडोज के 66 मामलों में लोगों की मौत दर्ज की गई हैं। नशा तस्करों की करीब 51 करोड़ रुपये से अधिक की अवैध संपत्ति जब्त की जा चुकी है और 123 सरकारी और पुलिस कर्मियों के विरुद्ध भी कार्रवाई की गई है।
सुखविंद्र सिंह सुक्खू, मुख्यमंत्री, हिमाचल प्रदेश
प्रदेश में चिट्टा माफिया के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनाई गई है। सरकार ने एंटी-चिट्टा अभियान, नशा तस्करों की संपत्ति जब्ती, वित्तीय जांच, पंचायत स्तर पर निगरानी और युवाओं में जागरूकता अभियान तेज किए हैं। साथ ही सरकारी नौकरियों और व्यावसायिक शिक्षण संस्थानों में डोप टेस्ट अनिवार्य करने का निर्णय भी लिया गया है, ताकि युवाओं को नशे से दूर रखा जा सके।
अशोक तिवारी, डीजीपी, हिमाचल प्रदेश
पुलिस अब केवल नशा बरामद करने तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे नेटवर्क, वित्तीय लेन-देन और संपत्तियों तक पहुंचकर कार्रवाई कर रही है। चिट्टा तस्करी में शामिल किसी भी व्यक्ति, चाहे वह कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, को बख्शा नहीं जाएगा। अभिभावकों से भी अपील है कि बच्चों के व्यवहार में बदलाव दिखने पर तुरंत सतर्क हों और पुलिस व नशामुक्ति संस्थानों का सहयोग लें।
क्या कहते हैं मनोचिकित्सक
आईजीएमसी अस्पताल के मनोचिकित्सक डा. दिनेशदत्त शर्मा का कहना है कि चिट्टा आत्यधिक नशे की लत पैदा करने वाला सिंथेटिक ड्रग है। इसकी नियमित खुराक लेने वाला व्यक्ति कुछ ही समय में मानसिक और शारीरिक रूप से पूरी तरह विचलित हो जाता है। इंजेक्शन के माध्यम से सेवन करने वालों में हेपेटाइटिस-बी, हेपेटाइटिस-सी, एचआईवी संक्रमण, हृदय रोग, किडनी और लीवर संबंधी गंभीर बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। चिट्टा छोड़ना अन्य नशों की तुलना में कहीं अधिक कठिन होता है और ओवरडोज से मौत का जोखिम भी अधिक रहता है।

