मंडी के भोला शर्मा के गले में कुदरत का संगीत, बचपन में दादा के साथ जंगल में बकरियां चराते सीखा हुनर।
हिमखबर डेस्क
कहते हैं कि अगर आप कुदरत को शिद्दत से सुनें तो वह आपसे बात करने लगती है। सुंदरनगर रियासत के अराध्य देव माहुनाग जी के कारिंदे भोला शर्मा इस बात की जीती-जागती मिसाल हैं।
करसोग के मूल निवासी 45 वर्षीय भोला शर्मा जब चहचहाना शुरू करते हैं तो इनसानी बस्ती में घने जंगल का अहसास होने लगता है।
वे एक-दो नहीं, बल्कि 161 दुर्लभ पक्षियों की हु-ब-हू आवाजें निकालकर विशेषज्ञों तक को हैरत में डाल देते हैं। भोला शर्मा की यह कला किसी संस्थान में नहीं बल्कि हिमालय की गोद में निखरी है।
वे याद करते हैं कि करीब चार दशक पहले जब वे अपने दादा जी के साथ बकरियां चराने जंगलों में जाते थे तो पक्षियों की चहचहाहट उन्हें बहुत पसंद आती थी।

नन्हीं उम्र में उन्होंने परिंदों को जवाब देना शुरू किया और धीरे-धीरे यह जुगलबंदी एक विलक्षण प्रतिभा में बदल गई। आज आलम यह है कि वे स्थानीय पक्षियों के अलावा जंगली जानवरों की दहाड़ और आवाजें भी उसी तीव्रता से निकालते हैं।
विदेशी मेहमानों की भाषा पर भी है पकड़
भोला शर्मा का जुनून यहीं नहीं थमता, सर्दियों के मौसम में जब सात समंदर पार से माइग्रेटरी बर्ड्स (प्रवासी पक्षी) हिमाचल की झीलों और जंगलों में डेरा डालते हैं तो भोला शर्मा घंटों एकांत में बैठकर उनकी बोलियों को गौर से सुनते हैं।
उनका दावा है कि वे इन विदेशी मेहमानों की आवाज को भी आत्मसात कर चुके हैं और अब उसे हु-ब-हू दोहरा सकते हैं। पर्यावरण संरक्षण के प्रति भोला शर्मा का यह समर्पण अद्भुत है। वे अपनी इस कला को अगली पीढ़ी तक ले जाना चाहते हैं ताकि बच्चों में पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता बढ़े।
ऐसे समय में जब मशीनी शोर के बीच पक्षियों की चहचहाहट खोती जा रही है, भोला शर्मा जैसे कलाकार प्रकृति की मौन आवाज बनकर उभरे हैं।
संदेश
भोला शर्मा बताते हैं कि मेरा मकसद मनोरंजन नहीं बल्कि एक संदेश है। आज हमारी बेलगाम जीवनशैली के कारण कई पक्षी लुप्त हो रहे हैं। मैं चाहता हूं कि बच्चे इन आवाजों को पहचानें, इनसे प्यार करें और इन्हें बचाने के लिए आगे आएं। जब हम उनकी भाषा समझेंगे तभी उन्हें सहेजने का जज्बा पैदा होगा।

