कांगड़ा: 100 वर्ष के रामकृष्ण शर्मा आज भी नौजवानों के लिए मिसाल

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स्वस्थ; सादगीपूर्ण और अनुशासित जीवन जीकर समाज के लिए प्रेरणा बने कांगड़ा के बुजुर्ग, संघर्ष-मेहनत-ईमानदारी-आत्मविश्वास के साथ पार की बाधाएं

हिमखबर डेस्क

धार्मिक नगरी कांगड़ा में 100 वर्ष की आयु पूरी कर चुके रामकृष्ण शर्मा आज भी अपने जीवन का हर कार्य स्वयं कर रहे हैं और स्वस्थ, सादगीपूर्ण तथा अनुशासित जीवन जीकर समाज के लिए प्रेरणा बने हुए हैं। शक्तिपीठ माता श्रीबज्रेश्वरी मंदिर के समीप स्थित अपने प्राचीन घर में परिवार के साथ रह रहे रामकृष्ण शर्मा की जीवन यात्रा संघर्ष, मेहनत, ईमानदारी और आत्मविश्वास की अनोखी मिसाल है।

रामकृष्ण शर्मा का जन्म 16 मई, 1926 को तलवाड़ा के गांव भटेड़ में हुआ था। बचपन में ही उनके जीवन में बड़ा दुख आ गया, जब मात्र अढ़ाई वर्ष की आयु में उनकी माता का देहांत हो गया। मां का साया सिर से उठने के बाद भी उन्होंने कठिन परिस्थितियों में हिम्मत नहीं हारी और संघर्ष के रास्ते पर आगे बढ़ते रहे। सिर्फ 10 वर्ष की आयु में वर्ष 1936 में वह लाहौर में एक अंग्रेज की फैक्टरी में काम करने चले गए। मेहनत और ईमानदारी के कारण फैक्ट्री मालिक उनसे बेहद प्रभावित था।

दो वर्ष बाद जब अंग्रेज मालिक लंदन लौटने लगा, तो उसने रामकृष्ण शर्मा को अपने साथ चलने का प्रस्ताव दिया, लेकिन उन्होंने अपना देश और मिट्टी नहीं छोड़ी। इसके बाद वह अमृतसर स्थित ग्रोवर ब्रदर्स की किताबों की दुकान पर कार्य करने लगे। वर्ष 1948 में प्रकाश ग्रोवर (ग्रोवर ब्रदर्स) ने कांगड़ा में अपनी शाखा खोली और दो वर्ष बाद दुकान का पूरा जिम्मा तथा स्टॉक रामकृष्ण शर्मा को सौंप दिया और कहा कि यह दुकान अब आप चलाओ आप मालिक हैं, पैसे जब होंगे, तब से देना।

100 वर्ष की आयु पार कर चुके रामकृष्ण शर्मा आज भी किसी गंभीर बीमारी से ग्रस्त नहीं हैं। वह शाकाहारी हैं और यही उनकी फिटनेस का सबसे बड़ा राज माना जाता है। वह अपना अधिकांश समय अपने पड़पोते-पड़पोतियों के साथ बिताते हैं। पूजा-पाठ में गहरी आस्था रखने वाले रामकृष्ण शर्मा भले ही पिछले 15 वर्षों से व्यापार से दूर हों, लेकिन आज भी उन्हें अपने संघर्ष और व्यापार की हर सीढ़ी याद है।

वह समय-समय पर अपने बच्चों को व्यापार से जुड़े अनुभव और मार्गदर्शन देते रहते हैं। एक सदी का जीवन पूरा कर चुके रामकृष्ण शर्मा आज भी जिस आत्मविश्वास, सादगी और सक्रियता के साथ जीवन जी रहे हैं, वह युवा पीढ़ी के लिए किसी प्रेरणा से कम नहीं है

दो बेटे संभाल रहे व्यापार, तीसरे कर रहे मरीजों की सेवा

रामकृष्ण शर्मा के तीन बेटे और एक बेटी हैं। बड़ा बेटे राजेंद्र शर्मा धर्मशाला में किताबों की दुकान चलाते हैं। छोटे बेटे सुमन शर्मा कांगड़ा में पारिवारिक व्यापार संभाल रहे हैं, जबकि तीसरे बेटे राकेश शर्मा डाक्टर हैं। उनकी तीन बहुओं में से दो हाउस मेकर और एक धर्मशाला अस्पताल में मेडिकल सुपरिंटेंडेंट हैं।

हर कठिन समय में मित्र ने भाई की तरह दिया साथ

वर्ष 1950 में उन्होंने ‘कृष्णा ब्रदर्स’ के नाम से अपने व्यापार की शुरुआत की। उस दौर में मेहनत और विश्वास के बल पर उन्होंने व्यापार को नई पहचान दिलाई। आज भी यह दुकान परिवार द्वारा संचालित की जा रही है। उनके बेटे सुमन शर्मा और पोते आदित्य शर्मा इस प्रतिष्ठान को आगे बढ़ा रहे हैं।

रामकृष्ण शर्मा बताते हैं कि जीवन के हर कठिन मोड़ पर उनके प्रिय मित्र ओम प्रकाश सोनी ने भाई की तरह उनका साथ दिया। शिक्षा विभाग में कार्यरत ओम प्रकाश सोनी से वह व्यापार और जीवन के महत्त्वपूर्ण फैसलों पर सलाह लेते थे।

पैदल चल जिला के स्कूलों तक पहुंचातेे थे किताबें

वर्ष 1950 में उनका विवाह कांगड़ा के अमरनाथ शास्त्री की बेटी से हुआ। इसके बाद वर्ष 1955 में उन्होंने किताबें छापने का कार्य शुरू किया और अपनी प्रिंटिंग प्रेस स्थापित की, जहां करीब 10 लोगों को रोजगार मिला। वह स्वयं पैदल चलकर जिला के विभिन्न स्कूलों तक किताबें पहुंचाते थे।

दुकान पर स्टेशनरी का हर छोटा-बड़ा सामान उपलब्ध रहता था। छात्र उनके पास पेन में स्याही भरवाने तक आते थे। उस दौर में 10 पैसे का ग्राहक भी उनके लिए उतना ही महत्त्वपूर्ण होता था, जितना बड़ा ग्राहक।

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