वीरगाथा : गोली लगने के बाद भी आतंकी को जिंदा पकड़ने वाला हिमाचल का वीर, आज यादों में जिंदा है कुलभूषण मांटा

--Advertisement--

हिमखबर डेस्क

जब कोई जवान देश की रक्षा करते हुए शहीद होता है, तो पूरा राष्ट्र उसके बलिदान को सलाम करता है। कुछ दिनों तक घर-घर में देशभक्ति की बातें होती हैं, शहीद के गांव में लोगों का तांता लगा रहता है और हर आंख नम दिखाई देती है। लेकिन समय के साथ यह शोर शांत हो जाता है। पीछे रह जाते हैं वो मां-बाप, पत्नी और बच्चे, जिनकी जिंदगी हमेशा के लिए बदल चुकी होती है।

ऐसी ही एक दर्दभरी कहानी हिमाचल प्रदेश के शिमला जिले की तहसील कुपवी के गौंठ गांव के शहीद राइफलमैन कुलभूषण मांटा की है, जिनकी शहादत आज भी पूरे क्षेत्र को भावुक कर देती है। कुलभूषण मांटा वर्ष 2014 में भारतीय सेना में भर्ती हुए थे। देशसेवा का जज्बा लेकर उन्होंने 52 राष्ट्रीय राइफल्स में अपनी जिम्मेदारी निभाई।

अक्टूबर 2022 में जम्मू-कश्मीर के बारामूला के घने जंगलों में आतंकियों के खिलाफ एक बड़ा ऑपरेशन चल रहा था। इस दौरान 26 वर्षीय कुलभूषण मांटा आतंकियों से बहादुरी से लोहा ले रहे थे। मुठभेड़ में गोली लगने के बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और एक आतंकी को जिंदा पकड़ लिया। हालांकि, अधिक रक्तस्राव के चलते 27 अक्टूबर 2022 को उन्होंने अंतिम सांस ली और मातृभूमि के लिए सर्वोच्च बलिदान दे दिया।

उनकी वीरता और अदम्य साहस के लिए भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत शौर्य चक्र से सम्मानित किया। दिल्ली में आयोजित सम्मान समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने यह सम्मान उनकी मां दुर्मा देवी और पत्नी नीतू को प्रदान किया। उस पल मां की आंखों में आंसू थे, लेकिन चेहरे पर बेटे की वीरता का गर्व भी साफ दिखाई दे रहा था।

आज शहादत के वर्षों बाद गौंठ गांव का माहौल सामान्य जरूर हो गया है, लेकिन कुलभूषण के परिवार का दर्द आज भी वैसा ही है। मां दुर्मा देवी बेटे की याद करते हुए भावुक हो जाती हैं। वह बताती हैं कि कुलभूषण अक्सर कहा करता था, “मां, देश के लिए शहीद होना गर्व की बात है।” उस समय मां उसे डांट देती थीं, लेकिन उन्हें क्या पता था कि बेटा सचमुच देश के लिए अपनी जान कुर्बान कर देगा।

पिता प्रताप मांटा कहते हैं कि बेटे की शहादत की खबर उनके जीवन की सबसे दर्दनाक रात थी। हालांकि, जब राष्ट्रपति भवन में बेटे का नाम और तस्वीर देखी, तो उनका सीना गर्व से चौड़ा हो गया। आज शहीद कुलभूषण मांटा के बूढ़े मां-बाप के जीने का सबसे बड़ा सहारा उनका तीन वर्षीय पोता “कार्तिक” है।

हालांकि वीरांगना नीतू अपने बेटे कार्तिक के साथ शिमला में रहती हैं, लेकिन दादा-दादी अपने पोते की मुस्कान में ही बेटे कुलभूषण की झलक तलाशते हैं। कुलभूषण मांटा भले ही इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी शहादत और परिवार का त्याग हमेशा अमर रहेगा।

--Advertisement--
--Advertisement--

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Share post:

Subscribe

--Advertisement--

Popular

More like this
Related

जूतों की माला पहनाई, जबरन पेशाब पिलाया, तलाकशुदा महिला से शादी की खौफनाक सजा

हिमखबर डेस्क राजस्थान के अजमेर में इंसानियत को शर्मसार करने...

इंस्टाग्राम पर हुई दोस्ती प्यार में बदली, शादी के चार दिन बाद युवती को साथ ले गई पुलिस

हिमखबर डेस्क सोशल मीडिया के दौर में इंस्टाग्राम पर हुई...

कांग्रेस का दावा: निकाय चुनाव 2027 विधानसभा चुनाव का सेमीफाइनल, फाइनल भी जीतेंगे

हिमखबर डेस्क प्रदेश कांग्रेस ने नगर निकायों के चुनावों में...

सलासी में स्थापित किया गया है ‘किताब घर’

हिमखबर डेस्क यशपाल साहित्य प्रतिष्ठान नादौन के भवन को गिराकर...