हिमखबर डेस्क
हिमाचल प्रदेश के डा. राजेंद्र प्रसाद मेडिकल कालेज एवं अस्पताल कांगड़ा टांडा के विशेषज्ञों ने स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में इतिहास रच दिया। विशेषज्ञों ने हिमाचल का पहला रोबोटिक किडनी ट्रांसप्लांट किया। कुल्लू निवासी स्वर्णकार अजय को पत्नी लवली ने किडनी दी। इस ट्रांसप्लांट में नेफ्रोलाजी, किडनी ट्रांसप्लांट, सर्जरी व एनेस्थीसिया विभाग की टीम शामिल रही।
टांडा मेडिकल कालेज एवं अस्पताल के नेफ्रोलाजी व किडनी ट्रांसप्लांट विशेषज्ञ अब तक 23 किडनी ट्रांसप्लांट कर चुके हैं। 42 वर्षीय अजय चार वर्ष से किडनी की बीमारी से जूझ रहे थे। पहले डायलिसिस के सहारे रहे, लेकिन जब बात ट्रांसप्लांट तक पहुंच गई तो वह पीजीआइ चंडीगढ़ और मैक्स अस्पताल के भी चक्कर लगा आए।
इसके बाद थक-हार कर वह टांडा मेडिकल कालेज एवं अस्पताल पहुंचे। यहां नेफ्रोलाजी विभागाध्यक्ष डा. अभिनव राणा ने ट्रांसप्लांट से संबंधित सभी टेस्ट व जांच के बाद रोबोट के माध्यम से किडनी ट्रांसप्लांट के लिए किडनी ट्रांसप्लांट विशेषज्ञ डा. अमित शर्मा व सर्जरी विभाग के विशेषज्ञों से चर्चा की।
मंगलवार को हिमाचल का पहला रोबोटिक किडनी ट्रांसप्लांट किया गया। आपरेशन रात 10 बजे तक चला। आपरेशन के बाद पति-पत्नी को सघन चिकित्सा वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया है। दोनों की हालत स्थिर बनी हुई।

डा. मिलाप शर्मा प्राचार्य मेडिकल कालेज एवं अस्पताल टांडा के बोल
23वें किडनी ट्रांसप्लांट से संस्थान की विशेषज्ञता और मजबूत हुई है। हिमाचल का पहला रोबोटिक किडनी ट्रांसप्लांट करके टांडा मेडिकल कालेज एवं अस्पताल अत्याधुनिक चिकित्सा सेवाओं के क्षेत्र में अग्रणी संस्थान के रूप में उभरा है।
ये रहे टीम में शामिल
नेफ्रोलाजी विशेषज्ञ डा. अभिनव राणा, किडनी ट्रांसप्लांट विशेषज्ञ डा. अमित शर्मा, सर्जन डा. सोमराज महाजन, डा. आशीष शर्मा, डा. दीपेश, डा. कुशल, डा. दिव्यम, डा. साक्षी व डा. हर्षिता। एनेस्थीसिया टीम का नेतृत्व डा. ननीश ने किया। पूरी प्रक्रिया का समन्वय ट्रांसप्लांट कोआर्डिनेटर नीरज जम्वाल और कल्पना शर्मा ने किया। आपरेशन थियेटर स्टाफ के सहयोग से यह अत्याधुनिक सर्जरी सफल हो सकी।
इसलिए लाभकारी है रोबोटिक सर्जरी
- अधिक सटीकता : रोबोटिक उपकरण सूक्ष्म स्तर पर काम करते हैं, जिससे विशेषज्ञ नसों और टिश्यू को बेहतर तरीके से संभाल पाते हैं।
- कम खून बहना : इस तकनीक में कट छोटे और नियंत्रित होते हैं, जिससे रक्तस्राव कम होता है।
- छोटा चीरा : पारंपरिक सर्जरी की तुलना में छोटे चीरे लगते हैं, जिससे दर्द कम होता है और निशान भी छोटे रहते हैं।
- जल्दी रिकवरी : मरीज जल्दी ठीक होता है और अस्पताल में रहने की अवधि कम हो जाती है।
- संक्रमण का कम खतरा : छोटे चीरे और कम एक्सपोजर के कारण संक्रमण का जोखिम कम रहता है।

