रोबोट हैं, लेकिन गर्भ में बच्चे की धड़कन सुनने वाला डॉप्लर नहीं! हिमाचल की स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल

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हिमाचल प्रदेश में गर्भवती महिला की मौत के मामले ने अस्पतालों में उपलब्ध स्वास्थ्य सुविधाओं पर सवाल खड़े किए हैं, आधुनिक चिकित्सा तकनीक के बावजूद भ्रूण की धड़कन जांचने के लिए डॉप्लर उपकरण की उपलब्धता को लेकर चिंता जताई जा रही है।

शाहपुर – नितिश पठानियां

हिमाचल प्रदेश के कुछ बड़े सरकारी मेडिकल कॉलेज एक वर्ष से रोबोटिक सर्जरी जैसी सुविधा उपलब्ध होने के कारण चर्चा में हैं। समय और संसाधन बचाते हुए आधुनिक तकनीक का जीवन के पक्ष में खड़े होना अच्छा है। इन अच्छे संकेतों के बावजूद बुरा है… कभी कुल्लू और कभी ऊना अस्पताल में गर्भवतियों का नवजात समेत हमेशा के लिए सो जाना। डॉक्टर और मरीज के बीच अप्रिय स्थितियां कमला नेहरू अस्पताल, आइजीएमसी शिमला से आरंभ होकर कुल्लू और फिर ऊना अस्पताल तक पहुंच गईं।

ताजा घटनाक्रम ऊना अस्पताल का रहा, जहां जच्चा-बच्चा की मौत हुई थी। स्त्री रोग चिकित्सक को निलंबित किया जा चुका है। ऐसे मामलों में, पहले पीड़ित परिवार न्याय मांगते हैं, बाद में चिकित्सक अपनी व्यथा कहते हैं। मुख्य चिकित्सा अधिकारी के साथ हाथापाई करने वाले तत्वों के विरुद्ध भी प्राथमिकी दर्ज होने की बात आ रही है और न्याय इन दोनों पक्षों से दूर… व्यवस्था से जुड़े उन सुराखों में छुपा है, जिन्हें कब का भर दिया जाना चाहिए था लेकिन भरे जाने से विपरीत, वे अस्पताल की व्यवस्था में और गहराते जाते हैं।

वास्तविकता यह है कि अस्पतालों में रोबोटिक सर्जरी भले ही पहुंच गई हो, छोटे छोटे उपकरण और आधारभूत संवाद का सलीका नहीं पहुंचा। चिकित्सक की मेज के उस पार से लेकर इस ओर तक इतना अंतर है कि अब भाषा का स्थान विवाद, नारों और अंतत: हिंसा ने ले लिया है। ऊना वाले मामले में चिकित्सक महोदया ने कहा कि बच्चे की धड़कन सुनाई नहीं दे रही है, अल्ट्रासाउंड करना पड़ेगा।

करोड़ों के रोबोट का स्वागत है लेकिन 10 से 20 हजार का फीटल डाप्लर भी हो तो बच्चे की धड़कन सुनी और सबको सुनाई जा सकती है। स्वजन का आरोप है कि इसी क्रम में विलंब हुआ और बच्चे के साथ जच्चा की भी मृत्यु हो गई। सवाल यह है कि क्या 10,000 रुपये का डाप्लर उस ऊना को भी प्राप्त नहीं हो सका, जहां से उपमुख्यमंत्री आते हैं? ध्यान यह भी देना होगा कि जननी सुरक्षा राष्ट्रीय कार्यक्रम है।

जिस 108 एंबुलेंस के टायर घिस जाते हैं, जिस 108 का डीजल मुद्दा बन जाता है, उसी के प्रशिक्षित कर्मचारी उस महिला का भी सुरक्षित प्रसव करवा देते हैं, जिसे कोई सरकारी अस्पताल यह कह कर रेफर करता है कि यह संवेदनशील मामला है, आप किसी बड़े अस्पताल जाइए। प्रसव से जुड़े मामलों में ही देखें तो 108 एंबुलेंस पर निर्भरता और उसके उपयोग में हिमाचल प्रदेश तीन प्रतिशत के साथ सबसे आगे खड़ा है।

सवाल यह है कि फिर जिलास्तरीय अस्पताल में क्यों ऐसी नौबत आती है कि सीएमओ के साथ दुर्व्यवहार होता है और संबंधित चिकित्सक आक्रोशित भीड़ की मंशा को भांपते हुए खिड़की फांद कर अस्पताल से निकल जाती हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि प्रतीकात्मकता ने व्यावहारिकता का स्थान ले लिया है। छोटे छोटे अभाव और अपेक्षाएं बड़े हादसों तक पहुंचा देती हैं।

हिमाचल प्रदेश में 2017 से मेडिपर्संस एक्ट लागू है। यानी हिमाचल प्रदेश देश के उन 23 से अधिक राज्यों में शामिल है जहां डाक्टर के साथ दुर्व्यवहार संज्ञेय अपराध है। आंकड़ा कितना है… शायद एक या दो।

हिमाचल प्रदेश में अनुमानित कुल संस्थागत गर्भवतियों का 26.3 प्रतिशत हिस्सा 108 या 102 एंबुलेंस सेवा से माध्यम से अस्पताल पहुंचा। यह संख्या सभी राज्यों में सबसे अधिक थी। कुल संस्थागत प्रसवों में से 3.0 प्रतिशत प्रसव ऐसे थे, जिन्हें एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल रेफर करने के लिए इसी का उपयोग किया गया। यह आंकड़ा गुजरात और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों से भी अधिक है।

हिमाचल प्रदेश में एंबुलेंस के रास्ते में रहते हुए प्रसव होने की दर अन्य राज्यों की तुलना में अधिक पाई गई है। करीब बिना रेफर किए गए 3.5 प्रतिशत और रेफर किए गए मामलों में 1.7 प्रतिशत महिलाओं का सुरक्षित प्रसव एंबुलेंस के भीतर हुआ। फिर अस्पतालों में ऐसा क्या हो जाता है, प्रश्न यह है।

एम्स बिलासपुर के दीक्षा समारोह में आईं राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु कह गई हैं कि डाक्टरों को दुर्गम स्थानों में भी सेवा करनी चाहिए। महामहिम! अब तो ऐसा प्रतीत हो रहा है कि सुगम क्षेत्र में भी सेवा देना दुरूह होता जा रहा है। कारण यह है कि छोटी-छोटी व्यवस्थागत कमियां हैं। कहीं सीवन सिलने के लिए सुई का विकल्प तलवार है और जहां तलवार चाहिए वहां केवल सुई है। इस सबमें वह संवाद गुम है जो एक मरीज और रोगी या उसके स्वजन के बीच होना चाहिए।

हिमाचल प्रदेश जैसे राज्य में जहां अब कई मेडिकल कालेज अस्पताल और एक एम्स होने के बावजूद विश्वास का सूचकांक कम हो रहा है तो ये छोटे-छोटे कारण हैं। सच यह है कि प्रशासनिक क्षीणता के कारण ये घटनाएं होती हैं। यदि टांडा अस्पताल में पर्ची बनाने वाले का पिटना गलत है, ऊना में सीएमओ पर हमला भी उतना ही गलत है। स्वास्थ्य मंत्री जी, अस्पतालों में फीटल डाप्लर अनिवार्य कर दीजिए।

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