मणिपुर में शहीद हुए राइफलमैन भीमसेन की शहादत को भूल गई हिमाचल सरकार

--Advertisement--

Image

कोटला – स्वयंम

उपमंडल जवाली के अधीन पंचायत राजोल के शहीद भीमसेन की पत्नी रेखा देवी व माता-पिता आज भी सरकार की तरफ सुविधाओं के लिए टकटकी लगाए बैठे हैं लेकिन बार-बार सीएम के दरवार फरियाद लगाने के बाद भी कोई सुनवाई नहीं हो रही है।

शहीद की शहादत को युगों-युगों तक याद रखने व शहीद के परिवार का हर सुख-दुख में साथ देने का वादा तो किया जाता है लेकिन चार दिन के बाद सरकार शहीद की शहादत को भुलाकर उसके परिवार का कुशलक्षेम तक नहीं पूछती है।

राजोल के भीमसेन पुत्र स्व पियोन्दी राम असम राइफल में बतौर राइफलमैन कार्यरत था तथा मणिपुर में वर्ष 2002 में आंतकवादी हमले में शहीद हो गए थे। शहीद राइफलमैन भीमसेन को को मणिपुर सरकार ने तो मरणोपरांत सेना मेडल देकर सम्मान दे दिया लेकिन हिमाचल सरकार शहीद की शहादत को ही भूल गई।

शहीद भीमसेन के घर तक न तो पक्की सड़क बन पाई है और न ही उसकी शहादत में गेट का निर्माण हो पाया है। शहीद भीमसेन के गांव के लोग आज भी खड्ड पार कर अपनी रोजमर्रा की जरूरत की खरीदारी के लिए आवाजाही करने को मजबूर हैं। हालांकि इस खड्ड पर पुल निर्माण का आश्वासन दिया गया था, लेकिन आजतक कुछ नहीं हो पाया है। वर्ष 2002 में टूटा दुखों का पहाड़ आज भी बरकरार है।

शहीद का 18 वर्षीय बेटा आशीष 33 असम राइफल यूनिट में भर्ती के लिए आवेदन दिया तथा उच्चाधिकारियों ने स्वीकार करते हुए उसे कॉल लेटर भेज दिया था लेकिन जब 8 जून 2018 को  शहीद का बेटा भर्ती के लिए जा रहा था उससे पहले ही कोटला में ही रास्ते में उसकी दुर्घटना हो गई। इस दुर्घटना में आशीष 60प्रतिशत तक दिव्यांग हो गया।

वर्ष 2019 में जब दोबारा से असम राइफल यूनिट के लिए सिविल सेवाओं में नौकरी के लिए आवेदन दिया गया तो उक्त यूनिट के उच्चाधिकारियों ने हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा प्रचलित कानून पैरामिलिट्री में शहीद हुए जवानों के आश्रितों के लिए नौकरी की व्यवस्था के प्रावधान के तहत सिफारिश की थी लेकिन असम राइफल की सिफारिश के बाद भी चार साल बीत जाने उपरांत भी हिमाचल सरकार शहीद के बेटे को नौकरी नहीं दे सकी।

कोटला में आयोजित मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर की जनसभा में भी शहीद भीमसेन की पत्नी रेखा देवी मुख्यमंत्री से मिली तथा सारी स्थिति के बारे में अवगत करवाया लेकिन मात्र आश्वासन ही मिल पाया। शहीद की पत्नी अपने दिव्यांग बेटे की नौकरी के लिए दर-दर भटक रही है।

शहीद की पत्नी की गुहार, बेटे को दी जाए नॉकरी।

शहीद की पत्नी रेखा देवी ने बताया कि दिव्यांग बेटे की नौकरी के लिए उच्चाधिकारियों और नेताओं तथा मुख्यमंत्री तक गुहार लगा चुकी हूं लेकिन अभी तक बेटे को नौकरी नहीं मिली। पति के जाने के बाद एक बेटा ही मात्र सहारा था लेकिन बेटे को नौकरी न मिलने से सारा परिवार टूट गया है। उन्होंने कहा कि मेरे कन्धों पर सास-ससुर व बेटे की देखरेख की जिम्मेवारी है। उन्होंने कहा कि हमारा परिवार आज भी सरकार की नजर ए इनायत को तरस रही है।

--Advertisement--
--Advertisement--

Share post:

Subscribe

--Advertisement--

Popular

More like this
Related

कांगड़ा एयरपोर्ट पर उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन को ‘गार्ड ऑफ ऑनर’

हिमखबर डेस्क  उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन का हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा...

महिला ने एचआरटीसी की चलती बस में पिछली सीट पर दिया बच्चे को जन्म, जानें पूरा मामला

हिमखबर डेस्क  हिमाचल पथ परिवहन निगम (एचआरटीसी) की बस में...

Himachal Panchayat Election: 15 मार्च को अंतिम नोटिफिकेशन, 20 तक होगा वार्डों का परिसीमन

हिमखबर डेस्क  हिमाचल प्रदेश में नई पंचायतों की फाइनल अधिसूचना...