कुल्लू दशहरा हिमाचल की समृद्ध धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं का प्रतीक है, मान्यता और परंपरा के अनुसार राजा ने भगवान रघुनाथ को अपना सिंहासन सौंप दिया, जिसके बाद कुल्लू दशहरा की अनूठी परंपरा आगे बढ़ी और आज यह विश्वभर में प्रसिद्ध उत्सव बन चुका है।
हिमखबर डेस्क
देशभर में दशहरा भगवान श्रीराम की रावण पर विजय के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है, लेकिन देवभूमि कुल्लू का दशहरा अपनी परंपराए इतिहास और देव संस्कृति के कारण बिल्कुल अलग पहचान रखता है। यहां विजयदशमी उस उत्सव का अंत नहीं, बल्कि सात दिवसीय देव महाकुंभ का आगाज है।
सैकड़ों देवी-देवता अपने हारियानों और वाद्ययंत्रों के साथ ढालपुर पहुंचकर भगवान रघुनाथ के दरबार में हाजिरी भरते हैं। इस अनूठी परंपरा का इतिहास करीब साढ़े तीन शताब्दी पुराना है। कुल्लू जिला प्रशासन के ऐतिहासिक विवरण के अनुसार राजा जगत सिंह ने 1637 से 1672 ई. तक कुल्लू पर शासन किया। उनके शासनकाल में अयोध्या से भगवान रघुनाथ की प्रतिमा कुल्लू लाई गई।
राजा ने भगवान रघुनाथ को अपने सिंहासन पर विराजमान कर स्वयं को उनका प्रथम सेवक माना। इसके बाद भगवान रघुनाथ कुल्लू घाटी के प्रमुख अधिष्ठाता देवता बने और राजाओं ने भी उनके नाम पर शासन किया। इसी घटनाक्रम से कुल्लू दशहरे की परंपरा का उदय माना जाता है। लोकमान्यता इस इतिहास को और रोचक बनाती है।
मान्यता है कि राजा जगत सिंह को एक ब्राह्मण के श्राप से मुक्ति पाने के लिए भगवान रघुनाथ की शरण लेने की सलाह दी गई थी। अयोध्या से भगवान रघुनाथ की प्रतिमा कुल्लू पहुंचने और उसे सिंहासन पर प्रतिष्ठित करने के बाद राजा ने राजसत्ता भगवान को समर्पित कर दी। ऐतिहासिक शोध भी कुल्लू दशहरा की शुरुआत को इसी घटनाक्रम और 17वीं शताब्दी से जोड़ते हैं।
कुल्लू दशहरे की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि जब देश के अन्य हिस्सों में विजयदशमी के साथ दशहरा संपन्न होने लगता है, उसी दिन कुल्लू में उत्सव शुरू होता है। भगवान रघुनाथ को सजे हुए लकड़ी के रथ में विराजमान किया जाता है। देवी हिडि़ंबा सहित घाटी के प्रमुख देवी-देवताओं की मौजूदगी में रथयात्रा निकलती है और हजारों श्रद्धालु रस्सियों से रथ खींचते हैं।
यहां दशहरा केवल रावण दहन तक सीमित नहीं है। सात दिन तक देव मिलन, पारंपरिक रस्में, रथयात्रा और लोक संस्कृति इसकी आत्मा बने रहते हैं। अंतिम दिन लंका दहन की परंपरा के साथ धार्मिक अनुष्ठान संपन्न होते हैं। करीब साढ़े तीन सौ वर्षों में कुल्लू दशहरा राजपरिवार की धार्मिक परंपरा से निकलकर विश्व प्रसिद्ध उत्सव बन चुका है।
आज इसे अंतरराष्ट्रीय उत्सव का दर्जा प्राप्त है और देश-विदेश से पर्यटक इसकी देव संस्कृति को देखने कुल्लू पहुंचते हैं। ढालपुर में जब देव रथों के साथ ढोल-नगाड़े गूंजते हैं, तो सदियों पुराना इतिहास मानो फिर जीवंत हो उठता है। यही कुल्लू दशहरे की सबसे बड़ी खूबी है। यह सिर्फ उत्सव नहीं, बल्कि देवभूमि की जीवित विरासत है।

