पांडवों के अज्ञातवास में बनाए ऐतिहासिक स्थल को निहारने रोजाना दूरदराज से पहुंच रहे पर्यटक
ज्वाली – अनिल छांगू
पौंग झील के मध्य पांडवों द्वारा अज्ञातवास के दौरान निर्मित ऐतिहासिक स्थल बाथू की लड़ी को निहारने पहुंच रहे पर्यटक इस बार मोटरबोट में बैठकर झील के बीच जाकर झील का नजारा देख रहे हैं। मोटरबोट से पर्यटक झील के बीच बने रैंसर दी गढ़ी टापू को भी निहारने जा रहे हैं।
मोटरबोट में बैठने वाले पर्यटकों की सुरक्षा का पूरा इंतजाम है। मोटरबोट में बैठने वाले पर्यटकों को सेफ्टी जैकेट पहनाई जाती है। इस बार विभाग ने पर्यटकों को झील का नजारा दिखाने के लिए मोटरबोट लगा रखी है जिसमें बैठकर पर्यटक खूब नजारा ले रहे हैं।
बाथू दी लड़ी के साथ-साथ इस बार मोटरबोट भी पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। रोजाना दूरदराज से काफी पर्यटक बाथू दी लड़ी को निहारने पहुंच रहे हैं। बाथू दी लड़ी को देखने हिमाचल के अलावा बाहरी राज्यों से पर्यटक आते हैंए इसके अलावा विदेशी पर्यटक भी आते हैं।
ये है बाथू की लड़ी का इतिहास
इस स्थल का निर्माण पांडवों ने स्वर्ग जाने के लिए किया था। इस स्थल पर छोटे-छोटे मंदिर भी निर्मित हैं तथा कुआं भी है। प्रवेश व निकासी द्वार भी निर्मित हैं। स्वर्ग को जाने के लिए बनाई गई लड़ी भी है जोकि अब खस्ताहालत हो चली है। इसका निर्माण एक ही रात में करना था। पांडवों ने छह माह की एक रात बना डाली।
अभी स्वर्ग तक पहुंचने को अढ़ाई सीढिय़ां शेष बची थीं कि तेलिन के चिल्लाने की आवाज आई। जिसके सुनते ही पांडव इसको अधूरा छोडक़र आगे चले गए। सारी सीढिय़ां भी गिर गईं। कहा जाता है कि पौंग झील बनने से पहले यहां पर द्रोपदी की शॉल भी थी तथा पांडवों द्वारा खेली गई गीटियां भी भारी भरकम पत्थरों के रूप में पड़ी हुई हैं।
पानी में समाए रहने के बाद भी इसकी नक्काशी को कोई फर्क नहीं पड़ा है। दूसरी रोचक बात यह है कि यह स्थल आठ माह तक झील के पानी में समाया रहता है तथा चार माह तक ही झील के बाहर आता है। चार माह में ही हजारों की तादाद में पर्यटक यहां पहुंचते हैं।

