कांगड़ा में टूट गया ‘वीरभद्र कैंप’, सुधीर-गोमा-केवल का सुक्खू कैंप में जाना बनी सबसे बड़ी चर्चा

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सुधीर-गोमा-केवल का सुक्खू कैंप में जाना बनी सबसे बड़ी चर्चा, सत्ता परिवर्तन के साथ बदलने लगी सियासी फिजाएं

व्यूरो रिपोर्ट

प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के साथ ही सियासी फिजाएं भी बदलने लगी हैं। प्रदेश के सबसे बड़े जिला कांगड़ा में वीरभद्र कैंप के सबसे प्रमुख सिपहसलारों में गिने जाने वाले पूर्व मंत्री सुधीर शर्मा, केवल सिंह पठानिया और यादविंद्र गोमा अचानक सुक्खू कैंप के साथ खड़े हो गए हैं।

ऐसे में मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू कैंप में विधायकों की संख्या में भी इजाफा होने से वह पहले से अधिक मजबूत होते जा रहे हैं।

बताया जा रहा है कि केवल सिंह और यादविंद्र गोमा तो पहले ही सारे मामले को भांप गए थे। टिकट के समय भी गोमा ने सुखविंद्र सिंह सुक्खू से मदद ली थी, उसके बाद ही उनकी टिकट फाइनल हो पाई थी।

अब चर्चा यह है कि तीन नेताओं का श्री सुक्खू के साथ तालमेल मिलाना कांगड़ा जिला के लिए कितना फायदेमंद हो सकता है। क्या यह नजदीकियां इन तीनों को सरकार में बड़ा ओहदा दिला पाएंगी। हालांकि ऐसा कहा जा रहा है कि तीनों की सुखविंदर सिंह सुक्खू से पूर्व में हुई वार्ता उनके करियर में चार चांद भी लगा सकती है।

प्रदेश की नई सरकार में नए समीकरण बनाने में भी कांगड़ा का अहम रोल रहता है। ऐसे में कांगड़ा से ही कांग्रेस के तीन बड़े नेताओं का वीरभद्र कैंप से चुनाव से पहले ही सुक्खू कैंप में चले जाना चर्चा का विषय बना हुआ है। पूर्व मंत्री सुधीर शर्मा पार्टी के राष्ट्रीय सचिव होने के साथ-साथ ब्राह्मण नेता व विजनरी नेता के रूप में उनकी पहचान है।

पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के वह राइट हैंड माने जाते थे, लेकिन अब सत्ता के साथ सियासी समीकरण भी बदल रहे हैं। उधर, जयसिंहपुर से दूसरी बार विधायक बनकर विधानसभा पहुंचे यादविंद्र गोमा कांग्रेस के एससी सैल के प्रदेश अध्यक्ष भी हैं। ऐसे में प्रदेश के एक बड़े वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाले गोमा का सुक्खू कैंप में चले जाना चर्चा बना हुआ है।

टिकट के समय गोमा को आए संकट के दौरान सुखविंद्र सिंह ने जो उनकी हेल्प की थी, उसके बाद से ही वह उनके कायल हो गए थे। यादविंद्र गोमा उनके पिता मिलखी राम गोमा के समय से ही वीरभद्र कैंप के सिपहसलारों में गिने जाते रहे हैं।

केवल सिंह पठानिया तो शुरुआती दिनों में ही वीरभद्र सिंह के सबसे नजदीकियों में शुमार रहे हैं, लेकिन अब सियासी फिजाएं बदलने के साथ ही सभी नए रोल में दिख रहे हैं।

दिखेंगे कई बदलाव

कांगड़ा के नेताओं की शिमला के साथ-साथ कांगड़ा में भी खूब सियासी चर्चा है। ऐसे में अब जिले के अन्य नेताओं का भी धीरे-धीरे सत्ता के साथ चलने का अनुमान लगाया जा रहा है। हालांकि परिणाम से पहले कांगड़ा के तमाम नेता गुटबाजी से बचने के लिए दोनों ही खेमों से दूरी बनाए हुए थे, लेकिन धीरे-धीरे सत्ता के साथ चलने के प्रयास भी तेज होने लगे हैं, जिससे आने वाले दिनों में पहाड़ी प्रदेश की राजनीति में कई बदलाव देखने को मिलेंगे।

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