नंदपुर भटोली स्थित राजा गुलेर महल में छह दिवसीय चूने ब सुर्खी पर आधारित कार्यशाला हुई संपन्न

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नंदपुर भटोली- संजीव संधू

यूं तो भारतवर्ष में भवनों का निर्माण सुर्खी में चूना मिलाकर किया जाता रहा है। इस पद्धति से निर्मित मकान सैकड़ों वर्षो तक बुलंद रहने की क्षमता रखते हैं यही कारण है कि आज हम अनेकों स्मारकों जैसे महल , किले बावड़ी, तालाब, मंदिर , द्वार इत्यादि को सैकड़ों वर्ष बीत जाने के बाद भी मजबूती से खड़ा पाते हैं। सीमेंट जिसका उपयोग भारत में लगभग 1950 के दशक में घरों के निर्माण के लिए आरंभ हुआ जिसकी आयु केवल मात्र 50 से 60 वर्ष तक ही है।

सीमेंट से बने भवन एक शताब्दी मे ही अपना अस्तित्व खो देते हैं। इसके विपरीत चूने व सुर्खी से बने भवन केवल पर्यावरण की दृष्टि से ही उपयुक्त नहीं अपितु 1000 वर्ष तक अपना वजूद कायम रखने में भी सक्षम है। जिसका जिंदा जागता उदाहरण पोंग डैम क्षेत्र में स्थित बाथू की लड़ी मंदिर व क्षेत्र के अन्य मंदिरों, हरीपुर गुलेर महल के द्वार ,नूरपुर किल्ला ब कांगड़ा किल्ला इसके साक्षात उदाहरण है।

चूने व सुर्खी से भवन निर्माण की कला को आज हम खो चुके हैं। इसी कला को पुनः जीवित करने के लिए नंदपुर भटोली स्थित राजा गुलेर महल नंदपुर भटोली में इस कार्यशाला का दूसरी बार आयोजन किया गया ।जिसमें देशभर से 15 इंजीनियर,आर्किटेक्ट ने भाग लिया। कार्यशाला में मुख्य प्रशिक्षक रफीक मुवाल राजस्थान के चूरू जिला द्वारा अपनी टीम सहित नंदपुर भटोली में इस कला की बारीकियों की जानकारियां उपलब्ध करवाई गई।

दिल्ली, चंडीगढ़ ,शिमला ,हैदराबाद, पांडिचेरी आदि शहरों से आए हुए प्रशिक्षणार्थीयो द्वारा स्वयं अपने हाथों से लोई और थापी चला कर राजा गुलेर महल की दीवारों को नया जीवन दे रहे हैं। इस कार्यशाला की मुख्य संयोजक मूल रूप से ऑस्ट्रेलिया निवासी किम्बरलेह नाम की महिला है । किम्बरलेह पारंपरिक भवन निर्माण में बहुत ज्यादा रुचि रखती है ।

अतः बह इस कला की खूबियों को रेखांकित कर गर्व महसूस कर रही है। नंदपुर स्थित राजा गुलेर महल के जीर्णोद्धार में लगातार प्रयासरत कंवर राघव गुलेरिया के अनुसार इस कला को जीवित कर हम अपनी धरोहरो को बनाकर नया जीवन दे सकते हैं। विश्व विख्यात गुलेर हरिपुर आज भी बडी बेसब्री से अपने गौरवमई इतिहास को सुरक्षित रखने में बाट जोह रहा है।

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