पत्नी को गौशाला में रखने और शौचालय इस्तेमाल नहीं करने देने के मामले में हाईकोर्ट ने पति की तलाक याचिका खारिज कर दी, जानें कोर्ट ने क्या कहा।
हिमखबर डेस्क
पति नए मकान में रहता रहा और पत्नी उसी परिसर में बने एक कमरे या गौशाला में रहने को मजबूर थी। उसे घर के शौचालय और वॉशरूम के इस्तेमाल की सुविधा भी नहीं दी गई।
करीब 23 साल से पत्नी के अलग रहने को आधार बनाकर पति ने तलाक मांगा, लेकिन हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने उसकी याचिका खारिज कर दी। अदालत ने माना कि पत्नी के अलग रहने के पीछे उचित कारण था और पति अपने ही आचरण का लाभ उठाकर इसे परित्याग नहीं बता सकता।
न्यायमूर्ति अजय मोहन गोयल और न्यायमूर्ति योगेश जसवाल की खंडपीठ ने मंडी की फैमिली कोर्ट के 8 अगस्त 2019 के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें पति की तलाक की अर्जी खारिज की गई थी। पति ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(i-a) और 13(1)(i-b) के तहत पत्नी पर क्रूरता और परित्याग का आरोप लगाते हुए तलाक मांगा था।
पति का कहना था कि पत्नी 23 साल से उससे अलग रह रही है, परिवार की जिम्मेदारियां नहीं निभा रही है और उसके खिलाफ आपराधिक तथा घरेलू हिंसा से जुड़ी कार्यवाही भी कर चुकी है। पत्नी ने इन आरोपों से इनकार किया। उसका कहना था कि पति के व्यवहार के कारण उसे मुख्य मकान से अलग कर दिया गया और उसे बुनियादी सुविधाओं के बिना साथ लगते कमरे या गौशाला में रहना पड़ा।
सुनवाई के दौरान 2012 और 2014 में पुलिस के समक्ष हुए समझौते भी अदालत के सामने आए। इन समझौतों पर पति के हस्ताक्षर थे। इनमें पत्नी के साथ ठीक व्यवहार करने और उसे शौचालय तथा वॉशरूम का इस्तेमाल करने देने से जुड़ी बातें थीं। अदालत ने इन दस्तावेजों को पत्नी के पक्ष में महत्वपूर्ण साक्ष्य माना।
अदालत ने पाया कि पति और पत्नी एक ही परिसर में रहते हुए भी अलग-अलग जगह रह रहे थे और पत्नी के पास बुनियादी स्वच्छता सुविधाएं नहीं थीं। ऐसे में पत्नी के अलग रहने को उसकी अपनी इच्छा से विवाह संबंध खत्म करने की कोशिश नहीं माना जा सकता। अदालत के अनुसार उसके पास अलग रहने का उचित कारण था।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि केवल कानूनी कार्यवाही शुरू करना अपने आप में क्रूरता नहीं माना जा सकता। इस मामले में आपराधिक शिकायत समझौते के बाद वापस ली गई थी और उसे झूठी शिकायत साबित करने वाला कोई निष्कर्ष सामने नहीं था। घरेलू हिंसा की कार्यवाही में भी पत्नी को राहत मिली थी।
अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि पति पत्नी की ओर से क्रूरता या परित्याग साबित नहीं कर सका। साथ ही हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 23 के तहत कोई व्यक्ति अपने ही गलत आचरण का लाभ नहीं उठा सकता। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने पति की अपील खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट का तलाक से इनकार करने वाला आदेश बरकरार रखा

