हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने अपने फैसलों में स्पष्ट किया है कि यदि कोई कर्मचारी काम करने के लिए तैयार था, लेकिन विभाग की गलती के कारण उसे काम करने से रोका गया, तो ऐसी स्थिति में ‘नो वर्क, नो पे’ का नियम लागू नहीं भी हो सकता, हालांकि, वेतन का लाभ मामले के तथ्यों और अदालत के आदेश पर निर्भर करेगा।
हिमखबर डेस्क
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कर्मचारियों के अधिकारों को लेकर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि विभाग की लापरवाही या लंबी कानूनी लड़ाई के कारण किसी सफल कर्मचारी को नौकरी पर बहाल करने में देरी होती है, तो वह उस इंतजार की अवधि का पूरा वेतन पाने का कानूनी हकदार है। कोर्ट ने साफ किया कि ऐसे मामलों में कर्मचारी को वेतन से वंचित नहीं किया जा सकता, भले ही उसने उस दौरान वास्तव में कोई कार्य न किया हो।
क्या है पूरा मामला?
मुख्य न्यायाधीश जीएस संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन सी. नेगी की खंडपीठ ने यह महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है। अदालत ने सिंचाई एवं जन स्वास्थ्य विभाग डल्हौजी (वर्तमान में जल शक्ति विभाग) की ओर से दायर 4 अपीलों को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। यह पूरा विवाद दैनिक वेतनभोगी बेलदार अमर सिंह और उनके साथियों से जुड़ा है, जिन्हें वर्ष 2000 में विभाग ने नौकरी से निकाल दिया था।
लेबर कोर्ट के आदेश के बाद भी 6 साल तक चली टालमटोल
नौकरी से निकाले जाने के बाद कर्मचारियों ने कानूनी लड़ाई लड़ी। मई 2013 में लेबर कोर्ट (श्रम न्यायालय) ने कर्मचारियों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए विभाग को उन्हें तुरंत बहाल करने के आदेश दिए। हालांकि, सरकार ने इस आदेश को मानने के बजाय इसे चुनौती देना शुरू कर दिया। विभाग ने पहले हाईकोर्ट के सिंगल जज, फिर डिवीजन बैंच और अंततः सुप्रीम कोर्ट तक मामले को खींचा। इस विभागीय टालमटोल के कारण कर्मचारी मई 2013 से नवम्बर 2019 तक ड्यूटी से बाहर रहे।
‘नो वर्क-नो पे’ का नियम यहां लागू नहीं
हाईकोर्ट ने लेबर कोर्ट के 2013 के आदेश पर अपनी अंतिम मुहर लगाते हुए कहा कि कर्मचारी 2013 में ही केस जीत चुके थे और वे काम करने के लिए पूरी तरह तैयार थे। चूंकि विभाग ने उन्हें जबरन बेरोजगार रखा और ड्यूटी जॉइन नहीं करने दी, इसलिए इस स्थिति में ‘नो वर्क-नो पे’ (काम नहीं तो वेतन नहीं) का नियम लागू नहीं होता।
विभाग अपनी ही विफलता का फायदा नहीं उठा सकता
अदालत ने विभाग की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि जब तक उच्च अदालतों द्वारा लेबर कोर्ट के आदेश पर कोई औपचारिक ‘स्टे’ (रोक) नहीं लगाया गया था, तब तक विभाग की जिम्मेदारी थी कि वह कर्मचारियों को काम पर रखे। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोई भी विभाग अपनी ही विफलता, टालमटोल और कानूनी देरी का फायदा उठाकर कर्मचारियों के वेतन का हक नहीं दबा सकता।

