हिमाचल की देव परंपरा से जुड़ी एक अनोखी मान्यता और घटना चर्चा में है। देवताओं की हार और डायनों की जीत के बाद अब आगे क्या होने वाला है, इसे लेकर लोगों में उत्सुकता बनी हुई है।
हिमखबर डेस्क
तुगल क्षेत्र के प्रसिद्ध शक्तिपीठ माता बगलामुखी मंदिर सेहली में वार्षिक जाग का आयोजन बड़े ही हर्षोल्लास और भक्ति भाव के साथ किया गया। इस अवसर पर सेहली मंदिर में भजनों की अविरल धारा बही।
मंदिर के पुजारी अमरजीत शर्मा ने बताया कि जाग के अवसर पर पंचकूला हरियाणा के प्रसिद्ध गायक जसपाल जस्सी और जय पाल सहोता, यतिन, अभिनव, अग्नि भजन मंडली साईंगलु, शर्मा भजन मंडली सेहली व गायक नंदलाल द्वारा माता के भजनों की प्रस्तुति दी गई।
पुजारी अमरजीत शर्मा ने बताया कि रात 12 बजे माता की विशेष पूजा—अर्चना के साथ जाग का आयोजन आरंभ हुआ। जाग के दौरान देवताओं और डायनों के मध्य हुए युद्ध की कथा भी सुनाई गई, जिसमें गुरु ने देववाणी के माध्यम से बताया कि देवता आषाढ़ माह की शैणदेवी एकादशी को युद्ध के लिए प्रस्थान करते हैं और इसका निर्णायक युद्ध भाद्रपद माह में होता है।
पहला युद्ध समुद्र के टापू पर तथा अंतिम युद्ध घोषर धार नामक स्थान पर होता है। इस युद्ध में कुल सात बार देवताओं और डायनियों के बीच मुठभेड़ हुई। इनमें से तीन बार देवता विजयी रहे और चार बार डायनें। अंतिम युद्ध में डायनियां ‘शिख-पाथा’ लेकर चली गईं, जिसके कारण इस वर्ष उन्हें विजयी माना गया।
फसलें अच्छीं, पर आपदाओं का डर
मान्यता है कि यदि डायनें युद्ध में विजयी रहती हैं, तो वर्ष भर फसलें अच्छी रहती हैं। साथ ही असामयिक संकट होता है। इससे साल भर जनजीवन पर नकारात्मक प्रभाव, आपदा या जान-माल के खतरे के रूप में भी देखा जाता है।
दूसरी ओर देवता जीतते हैं, तो वर्षभर शांति और सुखमय माहौल रहता है, लेकिन फसलों के लिए यह उतना अनुकूल नहीं माना जाता।

