काव्या ने एक अंगुली से कविता लिख आत्मसम्मान का दिया संदेश

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भलाड- शिबू ठाकुर

भले सौ पाप हो जाएं, पर मैं वो खता न करूंगी। मैं बेटी हूं, पर कभी बेटी पैदा न करूंगी।  दिव्यांग काव्या वर्षा (30) पुत्री सेवानिवृत्त कैप्टन बलदेव राज, निवासी दरकाटी हिमाचल प्रदेश ज्वाली ने उक्त कविता आजकल बेटियों पर हो रहे अत्याचारों को देखकर लिखी है।

महिला दिवस पर काव्य वर्षा का कहना है कि सभी महिलाएं आत्म सम्मान की जिंदगी जीएं, चिंता का परित्याग करें। किसी पर बोझ न बनें। 30 वर्षीय काव्या वर्षा बचपन से दिव्यांग हैं। चलने फिरने में असमर्थ है। उसकी केवल बाएं हाथ की पहली अंगुली ही काम करती है। वो मोबाइल को चलाती हैं। उन्होंने कभी स्कूल का मुंह भी नहीं देखा। मोबाइल पर केवल एक अंगुली के सहारे कविता लिखने की उनकी कला को आज हर एक व्यक्ति सलाम करता है। बचपन से कविता में रुचि रखने वाली काव्या वर्षा का नाम वर्षा चौधरी है।

उनकी एक दिल्ली की दोस्त ने उन्हें काव्या वर्षा नाम देकर उनकी कला को सलाम किया है। उनकी.. इतने भरे शब्द मुझमें, कि मैं तोल नहीं सकती, वो पड़ी है किताब पर मैं खोल नहीं सकती। जबकि दूसरी कविता …मेरे पास जब भी आना तो एक किताब लेकर आना, नहीं भाता मुझे हजारों रंगों का स्वाद, तुम काली स्याही में लिपटे कुछ अल्फाज लेकर आना कविता को काफी पसंद किया गया।

काव्या वर्षा को गीत लिखने का भी शौक है। काव्य वर्षा की समाज नाम से लिखित कहानी पर बनी फिल्म अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कलाकारी फिल्म महोत्सव 2022 के लिए भी चयनित हुई है।

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