मान्‍यता: शिंकलधार में भगवान शिव ने जलाया था चूल्हा, मां पार्वती व नंदी के हैं पद चिह्न, देखिए तस्वीरों में

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पांगी, धर्म नेगी

हिमाचल प्रदेश को शिव भूमि के नाम से जाना जाता है। सावन मास में समस्त प्रदेश में भक्त शिव दर्शन व पूजापाठ करने पहाड़ों की ओर जाते हैं। पांगी की पीरपंजाल की पहाडिय़ों में उत्तर-पूर्व में पहाड़ी पर उभरे शिवलिंग के रूप में शिव दर्शन किए जाते हैं।

पांगी की ग्राम पंचायत हुडान के शिंकलधार में उत्तर-पूर्व दिशा में शिव परिवार के प्रतिरूपों के दर्शन करने और शिव कृपा पाने के लिए सावन मास में स्थानीय लोगों के अतिरिक्त देश-प्रदेश से सैकड़ों श्रद्धालु शिंकलधार में पहुंच रहे हैं। मान्‍यता है कि मान्‍यता है कि भगवान शिव व पार्वती ने यहां खाना बनाया था।

शिंकलधार में चट्टान पर बना शिवलिंग।

यह है मान्यता

मान्यता है कि शिंकलधार करीब 13 हजार फीट ऊंचाई पर लोगों को भोलेनाथ उन्हीं भक्तों को दर्शन देते हैं जो सच्चे मन से दर्शन करने जाते हैं अन्यथा साफ मौसम भी खराब हो जाता है। सोमवार व रविवार को शिवगणों की ओर से सुबह पूजा-अर्चना की जाती है। उस समय सच्चे शिवभक्त को शंख ध्वनि सुनाई देती है। भीम तलाई से शिव परिवार के प्रतिरूपों के दर्शन शुरू होते हैं। भीम तलाई से दो किलोमीटर की दूरी पर सांप के जोड़े के दर्शन होते हैं।

यह नाग-नागिन का जोड़ा ऊपर-नीचे आते-जाते पत्थर पर बने हुए हैं। इसके कुछ दूरी पर गंगा की धार बहती है। यहां पर श्रद्धालु हाथ-पांव धोते और स्नान करते हैं। शिंकलधार में अलग-अलग स्थानों पर शिवलिंग के अलावा माता पार्वती के पद चिन्ह, नंदी बैल, गणेश, शेषनाग, शिव घराट और भोलेनाथ के रोजमर्रा की चीजों के दर्शन भक्तों को करने के लिए मिलते हैं। शिंकलधार की पहाड़ी शेषनाग की आकृति में है।

माता पार्वती का पद चिन्‍ह।

चट्टान पर बने नंदी का पद चिन्‍ह।

 शिव गंगा जहां स्‍नान कर श्रद्धालु पुण्‍य कमाते हैं।

शिंकलधार में पत्‍थर के रूप में नंदी बैल का प्रतिरूप।

 

सिद्धबाबा (भूतनाथ) किरयूनी शिवभक्त रूप सिंह ठाकुर का कहना है यहां पर भोलेनाथ के वे सभी अवशेष मौजूद हैं जिनके दर्शन के लिए श्रद्धालुओं में जिज्ञासा होती है। सावन मास में जो भी भक्त सच्चे मन से भोलेनाथ के दर्शन करता है उसकी हर इच्छा पूरी होती है। हुडान पंचायत के सड़क सुविधा से जुडऩे के बाद यहां शिव भक्तों की संख्या में हर साल बढ़ोतरी होती जा रही है। हुडान पंचायत के अंतिम गांव अंदरली भटौरी तक बस जाती है। अगर पर्यटन विभाग व प्रदेश सरकार मणिमहेश और अमरनाथ की तर्ज पर ट्रस्ट का गठन करके जीर्णोद्धार करे तो यहां पर श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ सकती है।

शिंकलधार में शेषनाग की आकृति में पहाड़ी।

ऐसे पहुंचें शिंकलधार

शिवलिंग के दर्शन करने के लिए पहुंचने के लिए तीन रास्ते हैं। तीनों सड़क मार्ग हैं। इसके लिए सभी रास्ते किलाड़ पहुंचाते हैं जहां से शिकंलधार पहुंचा जा सकता है।

पहला रास्ता : पठानकोट से सड़क से होते हुए 120 किलोमीटर दूर चंबा पहुंचें। उसके बाद सड़क के जरिए चंबा से तीसा व बैरागढ़ पहुंचें। उसके बाद बैरागढ़ से किलाड़ पहुंचना होगा। सड़क मार्ग के जरिए किलाड़ से हुडान (करीब 20 किलोमीटर) तक पहुंचें। हुडान से करीब 700 मीटर भीम तलाई से छह-सात किलोमीटर की पैदल यात्रा में शिकंलधार में शिव परिवार के प्रतिरूपों के दर्शन होते हैं।

दूसरा रास्ता : दूसरा रास्ता मनाली से होकर है। मनाली से सड़क के जरिए केलंग होते हुए उदयपुर पहुंचें। यहां से पांगी के पहले गांव शौर पहुंचेंगे। फिर शौर से मिंदल माता, सिद्ध बाबा और यहां से किलाड़ पहुंचेंगे।

तीसरा रास्ता : तीसरा रास्ता जम्मू से होगा। जम्मू से किश्तवाड़ के बाद गुलाबगढ़ पहुंचेंगे। यहां से शोल गांव से होकर तियारी पहुंचेंगे। तियारी से पांगी की सीमा सुनसारी नाला में प्रवेश करेंगे। यहां से पांगी के पहले गांव लुज पहुंचेंगे। लुज से सड़क मार्ग से होते हुए किलाड़ पहुंचेंगे।

शिंकलधार में शिव परिवार का पनिहारा। माना जाता है कि भगवान शिव मकर संक्रांति के बाद एक माह के लिए जब चिनाब नदी में प्रवास के बाद अपने निवास स्‍थान पर वापस पहुंचे ताे यहां स्‍नान किया व कपड़े धोए थे।

 

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