हिमखबर डेस्क
मेले में घूमते लोगों के बीच जलेबी और पकौड़ों की खुशबू तो हर दुकान से आती है, लेकिन जोगिंदर नगर मेले में एक दुकान ऐसी भी है जहां स्वाद के साथ संघर्ष, मेहनत और परिवार की एकता भी परोसी जा रही है। अपने माता-पिता संग इस दुकान को चला रही हैं बरोट घाटी की पांच बहनें और एक भाई। खास बात ये है कि यहां कोई मदद नहीं करता, बल्कि परिवार का हर सदस्य बराबरी से जिम्मेदारी निभाता है। कोई जलेबी बना रहा है, कोई पकौड़े तल रहा है, तो कोई ग्राहकों को संभाल रहा है।

एक बहन सोनिया ने मुस्कुराते हुए कहा कि हम पांचों बहनें हाथ की उंगलियों की तरह हैं। देखने में कोई छोटी है, कोई बड़ी, लेकिन जब साथ आती हैं, तो हमसे ज्यादा ताकतवर कोई नहीं होता। उन्होंने दूसरी लड़कियों को संदेश देते हुए कहा कि लड़कियों को पापा की परी बनने की बजाय पापा की शेरनी बनना चाहिए। उन्होंने कहा कि वे सभी बहनें घर के पिल्लर हैं और उनके पापा घर की छत।
पापा को देख जलेबी बनाना सीख लिया
दूसरी बहन मोनिका ने बताया कि उनकी सबसे बड़ी बहन सोनिया जोगिंद्रनगर में फैशन डिजाइनिंग का कोर्स कर रही हैं, दूसरी बहन आशा जेबीटी के बाद प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रही है। मोनिका खुद पढ़ाई करती हैं। छोटी बहन सिमरन शमशी आईटीआई में इलेक्ट्रिशियन की पढ़ाई कर रही हैं। सबसे छोटी बहन पलक ने अभी बारहवीं की परीक्षा दी है। भाई ऋषिराज अभी दसवीं क्लास में हुआ है। मोनिका बताती हैं कि उनके पापा ने उन्हें सिर्फ पकौड़े बनाना सिखाया था, जबकि उन्होंने पापा को देख देख कर जलेबी बनाना भी सीख लिया।

यही रोजी-रोटी, यही गर्व
परिवार पिछले कई वर्षों से हर मेले में दुकान लगाता आ रहा है और करीब दो महीने तक अलग-अलग मेलों में इसी तरह मेहनत करता है। यही उनकी रोजी-रोटी है और यही उनका गर्व भी। मोनिका कहती हैं कि शाम तक सारी मिठाई बिक जाती है, तो सामान समेट कर पूरा परिवार टेंट में ही सो जाता है। आज के दौर में जहां अकसर बेटियों को बोझ समझा जाता है, वहीं यह परिवार उस सोच को चुपचाप जवाब दे रहा है। यहां बेटियां न सिर्फ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी हैं, बल्कि पूरे कारोबार की ताकत बनी हुई हैं।

