हिमखबर डेस्क
एक विशाल मैदान और बीच में एक शांत झील। चारों ओर देवदार के घने जंगलों का पहरा। लगता है कुदरत ने सब कुछ यहां ही न्योछावर कर दिया हो। हम बात कर रहे हैं 3100 मीटर की ऊंचाई पर स्थिर क्यूर डल झील की।
चंबा जिला के होली तहसील की ग्राम पंचायत दियोल में स्थित यह झील किसी स्वर्ग से कम नहीं है। स्थानीय जनश्रुतियों और मान्यताओं के अनुसार इस स्थान का धार्मिक महत्व कैलाश पर्वत से भी पुराना माना जाता है।
बुजुर्गों का कहना है कि सदियों पहले भगवान भोलेनाथ का वास यहीं हुआ करता था और मणिमहेश भी यहीं स्थित था। लोक मान्यता है कि क्यूर गांव के झील के समीप बस जाने के कारण वहां मानवीय हलचल बढ़ गई, जिससे भोले बाबा के ध्यान में बाधा उत्पन्न होने लगी।
इस कारण उन्होंने यह स्थान छोडक़र कैलाश पर्वत की ओर प्रस्थान किया। हर साल जन्माष्टमी और राधाष्टमी के पावन अवसर पर हजारों श्रद्धालु शाही स्नान के लिए क्यूर डल झील पहुंचते हैं।
हिमाचल का प्रमुख पर्यटन स्थल बन सकता है
ग्रामीणों का कहना है कि कुछ साल पहले यहां के लिए सडक़ निर्माण का कार्य शुरू होने की उम्मीद जगी थी, लेकिन वन विभाग की क्लीयरेंस न मिलने से सडक़ नहीं बन पाई। सडक़ न होने से यहां तक पहुंचना आज भी एक बड़ी चुनौती है।
अगर प्रदेश सरकार और प्रशासन इस ओर थोड़ा भी ध्यान दें तो क्यूर डल झील न केवल एक प्रमुख पर्यटन केंद्र बनकर उभर सकती है, बल्कि इससे स्थानीय युवाओं को स्वरोजगार के बेहतरीन अवसर भी मिल सकते हैं। होम-स्टे, गाइडिंग और स्थानीय हस्तशिल्प को बढ़ावा देकर इलाके की आर्थिकी को बदला जा सकता है।
गुमनामी के अंधेरे में लेक
शांति और सुकून की तलाश करने वाले पर्यटकों के लिए यह एक आदर्श स्थल हो सकता है, लेकिन दुर्गम रास्ते और बुनियादी ढांचे की कमी इसकी राह में सबसे बड़ा रोडा हैं। तहसील होली की ग्राम पंचायत दियोल से मात्र चार किलोमीटर की दूरी पर स्थित क्यूर डल गुमनामी के अंधेरे में है।
इस स्थल का पर्यटन स्थल के तौर पर विकसित कर युवाओं के लिए स्वरोजगार के द्वार खोलने की दिशा में कोई काम नहीं हो पाया है। स्थानीय निवासियों ने एक बार फिर सरकार से गुहार लगाई है कि इस अनछुए स्वर्ग की सुध ली जाए, ताकि आस्था का यह केंद्र और प्रकृति का यह अनुपम उपहार दुनिया के सामने अपनी चमक बिखेर सके।

