इत्मिनान से सोचिए…तनाव-अवसाद-गुस्सा या नशा, अपराध के दलदल में क्यों धंस रही हिमाचल की जवानी?

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हिमखबर डेस्क

हिमाचल में हाल हीके दिनों में कम उम्र के युवाओं से जुड़े हत्या और अन्य हिंसक अपराधों के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। छोटी-छोटी कहासुनी या व्यक्तिगत विवाद कई बार इतने गंभीर हो रहे हैं कि उनका अंत हत्या जैसे जघन्य अपराध में हो रहा है। इन घटनाओं ने समाज के साथ-साथ स्वास्थ्य विशेषज्ञों की भी चिंता बढ़ा दी है।

विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों की रोकथाम के लिए केवल कानूनी कार्रवाई ही नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता, पारिवारिक संवाद और समय पर परामर्श भी बेहद आवश्यक है।

क्षेत्रीय अस्पताल सोलन के मुख्य चिकित्सा अधिकारी सोलन डॉ. अजय पाठक ने कहा कि बदलती जीवनशैली, बढ़ता मानसिक तनाव, नशे की प्रवृत्ति, पारिवारिक संवाद की कमी और भावनाओं पर नियंत्रण न रख पाना ऐसे मामलों के पीछे प्रमुख कारण बनकर उभर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य की अनदेखी कई बार व्यक्ति को ऐसे कदम उठाने के लिए प्रेरित कर सकती है, जिनका असर पूरे परिवार और समाज पर पड़ता है।

डॉ. अजय पाठक ने बताया कि आज की तेज रफ्तार जिंदगी में युवाओं पर पढ़ाई, रोजगार, आर्थिक जिम्मेदारियों और सामाजिक अपेक्षाओं का दबाव लगातार बढ़ रहा है। कई बार लोग अपनी मानसिक परेशानियों को किसी के साथ साझा नहीं करते, जिससे तनाव, अवसाद और गुस्सा बढ़ता जाता है।

यदि समय रहते इन समस्याओं की पहचान कर उनका उपचार नहीं किया जाए तो स्थिति गंभीर हो सकती है। उन्होंने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य भी शारीरिक स्वास्थ्य जितना ही महत्वपूर्ण है।

यदि किसी व्यक्ति के व्यवहार में अचानक बदलाव, अत्यधिक गुस्सा, चिड़चिड़ापन, अकेले रहना, निराशा, नशे की ओर झुकाव या हिंसक व्यवहार जैसे लक्षण दिखाई दें तो इन्हें सामान्य मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

ऐसे लोगों को परिवार का सहयोग और आवश्यकता पडऩे पर मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक की सलाह मिलनी चाहिए। सीएमओ ने कहा कि नशे का सेवन भी कई बार व्यक्ति की सोचने-समझने की क्षमता को प्रभावित करता है, जिससे वह आवेश में आकर गंभीर अपराध कर बैठता है।

इसलिए युवाओं को नशे से दूर रखने के लिए परिवार, स्कूल, कॉलेज और समाज को मिलकर प्रयास करने होंगे। उन्होंने कहा कि बच्चों और युवाओं के साथ नियमित संवाद, उनकी समस्याओं को धैर्यपूर्वक सुनना और सकारात्मक माहौल देना बेहद आवश्यक है।

डॉ. पाठक ने अभिभावकों से अपील की कि वे अपने बच्चों के व्यवहार में आने वाले बदलावों पर नजर रखें और उन्हें भावनात्मक सहयोग दें। उन्होंने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता बढ़ाना समय की आवश्यकता है।

यदि तनाव, अवसाद या गुस्से जैसी समस्याओं का समय रहते समाधान किया जाए तो कई अप्रिय और हिंसक घटनाओं को रोका जा सकता है। उन्होंने कहा कि समाज में बढ़ते ऐसे मामलों मे को केवल कानून के माध्यम से नहीं, बल्कि जागरूकता, संवाद, समय पर उपचार और सामूहिक प्रयासों से भी काफी हद तक कम किया जा सकता है।

जागरूकता अभियान की जरूरत

सोशल वर्कर विजय लांबा ने प्रशासन से अपील की कि युवाओं में बढ़ते हिंसक अपराधों और हत्या जैसे मामलों को गंभीरता से लेते हुए मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता अभियान चलाए जाएं। उन्होंने कहा कि स्कूलों, कॉलेजों और अन्य शिक्षण संस्थानों में नियमित रूप से काउंसलिंग सत्र, नशा मुक्ति अभियान और तनाव प्रबंधन कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए।

इसके साथ ही युवाओं के लिए खेल, सांस्कृतिक और रचनात्मक गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाए, ताकि उनकी ऊर्जा सकारात्मक दिशा में लग सके। उन्होंने अभिभावकों से भी बच्चों के साथ खुलकर संवाद करने और उनके व्यवहार में आने वाले बदलावों पर समय रहते ध्यान देने की अपील की।

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