अथाह अनुभूति

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हिमखबर – डेस्क काँगड़ा

हजारों तंत्र हो मुझ में, हजारों मंत्र हो मुझ में
मैं फिर भी लीन रहू तुझ में।

न ज्ञान का अहंकार हो मुझ में, न आज्ञान का भंडार हो मुझ में
मैं फिर भी लीन रहू तुझ में।

योग का भंडार हो मुझ में, तत्व का महाज्ञान हो मुझ में
मैं फिर भी लीन रहू तुझ में।

न जीत का एहसास हो मुझ में, न हार का ह्रास हो मुझ में
मैं फिर भी लीन रहू तुझ में।

न जीवन की चाह हो मुझ में, न मृत्यु की राह हो मुझ में
मैं फिर भी लीन रहू तुझ में।

मौलिकता प्रमाण पत्र

मेरे द्वारा भेजी रचना मौलिक तथा स्वयं रचित जो कहीं से भी कॉपी पेस्ट नहीं है।

राजीव डोगरा, (भाषा अध्यापक), राजकीय उत्कृष्ट वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय, गाहलिया
पता-गांव जनयानकड़, पिन कोड -176038, कांगड़ा हिमाचल प्रदेश
9876777233, rajivdogra1@gmail.com

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