हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा में सायर पर्व लोक संस्कृति और परंपराओं से गहराई से जुड़ा है। गांवों में आज भी सायर के अवसर पर उत्सव का माहौल देखने को मिलता है। यह पर्व स्थानीय रीति-रिवाजों और आपसी भाईचारे की खूबसूरत झलक पेश करता है।
शाहपुर – नितिश पठानियां
हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिला की समृद्ध लोक संस्कृति में सायर (स्थानीय बोली में सैर) त्योहार का विशेष स्थान है। बदलते समय के साथ जीवनशैली भले ही बदल गई हो, लेकिन कांगड़ा की मिट्टी में रची-बसी इस परंपरा की खुशबू आज भी लोगों के दिलों में कायम है।
सायर को नई फसल, प्रकृति और खुशहाली के प्रति कृतज्ञता का पर्व माना जाता है। सावन-भादों के बाद खेत-खलिहानों में हरियाली और ग्रामीण जीवन में नई उमंग के बीच यह त्योहार उल्लास के साथ मनाया जाता है।
घरों में पारंपरिक पकवान बनते हैं और परिवार के लोग मिलकर खुशियां साझा करते हैं। शिवभूमि बैजनाथ उपमंडल में सायर की एक खास परंपरा बच्चों के अखरोट खेलने की है। बच्चे अखरोट खेलते हुए उन्हें इक_ा करते हैं।
वहीं कांगड़ा के कई क्षेत्रों में सायर की पूर्व संध्या पर एक विशेष वर्ग द्वारा टोकरी में इस मौसम में तैयार होने वाली फसलों को सजाया जाता है। इस टोकरी को घर-घर ले जाकर उसकी पूजा की जाती थी। समय के साथ कुछ स्थानों पर यह परंपरा लगभग समाप्त हो गई है, लेकिन कई गांवों में आज भी इसकी झलक देखने को मिलती है।
सायर के अवसर पर लगने वाले मेले और सांस्कृतिक आयोजन लोकगीतों, लोकनृत्यों और पारंपरिक वाद्य यंत्रों के माध्यम से कांगड़ा की सांस्कृतिक विरासत को जीवंत कर देते हैं। यह पर्व रिश्तों में मिठास और समाज में आपसी भाईचारे का संदेश भी देता है।
आज जरूरत है कि सायर जैसी लोक परंपराओं को केवल त्योहार के रूप में नहीं, बल्कि कांगड़ा की सांस्कृतिक पहचान के रूप में नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाए। सायर कांगड़ा की उस मिट्टी की खुशबू है, जिसमें प्रकृति के प्रति कृतज्ञता, परिवार का प्रेम, सामाजिक भाईचारा और लोक संस्कृति की मिठास एक साथ महसूस होती है।

