हिमाचल प्रदेश में आलू की खेती कई क्षेत्रों में की जाती है, यहां की जलवायु और खेती की परिस्थितियां कुछ इलाकों में आलू उत्पादन के लिए अनुकूल हैं, जानिए किस जिले की आलू की फसल अपने स्वाद और खासियत के लिए जानी जाती है।
सिरमौर – नरेश कुमार राधे
हिमाचल के पहाड़ी क्षेत्रों उगाया जाने वाला ढांखरी आलू किसानों की प्रमुख फसलों में शामिल है। जिला सिरमौर के डियूड़ी खड़ाह, हरिपुरधार व जिला सिरमौर की सीमा पर स्थित जिला शिमला के नोरा, बोरा, कुपवी में इसकी खेती की जा रही है। ढांखरी आलू वर्ष में एक बार उगाया जाता है।
स्थानीय परिस्थितियों में उगाई जाने वाली इस पारंपरिक किस्म का नाम आज भी क्षेत्र के पुराने किसानों की जुबान पर है। हालांकि खेती के बदलते तौर-तरीकों, बाजार की चुनौतियों और किसानों को मिलने वाले लाभ के सवालों के बीच इसकी खेती को लेकर नए सिरे से चर्चा की जरूरत महसूस की जा रही है। इसका आकार अन्य आलू से अलग होता है। आम आलू का आकार गोल होता है, मगर इसका आकार लंबा होता है और खाने में यह बेहद स्वादिष्ट होता है।
ढांखरी आलू को उगाने की तकनीक
ढांखरी आलू को उगाने की तकनीक वैसी ही होती है, जैसे आम आलू को उगाया जाता है। इसका बीज सरकार ही देती है, मगर अकसर किसान बीज का भंडारण करते हैं। आलू की सबसे बड़ी विशेषता इसकी स्थानीय पहचान और पारंपरिक खेती से जुड़ाव है।
पीढिय़ों से पहाड़ी क्षेत्रों में आलू की खेती करने वाले किसानों के पास इसकी खेती, बीज के चयन और भंडारण से संबंधित स्थानीय अनुभव हो सकते हैं। इन्हीं अनुभवों को वैज्ञानिक जानकारी के साथ जोडक़र इस किस्म की उपयोगिता को बेहतर तरीके से समझा जा सकता है।
लंबे समय तक टिकाऊ, स्वाद लाजवाब
ढांखरी आलू बेहतर स्वाद, गुणवत्ता और लंबे समय तक टिके रहने की क्षमता के लिए जाना जाता है। ढांखरी आलू का रंग, आकार, स्वाद, पकने की अवधि, प्रति पौधा उत्पादन, भंडारण क्षमता और रोगों के प्रति प्रतिरोध को लेकर प्रमाणित आंकड़े उपलब्ध हुए बिना इसके बारे में निश्चित दावे करना उचित नहीं होगा। इन विशेषताओं का पता लगाने के लिए कृषि विशेषज्ञों, स्थानीय किसानों और कृषि अनुसंधान संस्थानों की मदद ली जा सकती है।
उगाने के लिए कैसा होना चाहिए मौसम
हिमाचल के ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों की जलवायु आलू उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है। प्रदेश के कृषि विभाग के अनुसार, यहां की ठंडी जलवायु और कुछ ऊंचाई वाले क्षेत्रों की परिस्थितियां रोगमुक्त बीज आलू तैयार करने के लिए अनुकूल हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में आलू की खेती का समय समुद्र तल से ऊंचाई, तापमान, बर्फबारी, बारिश और सिंचाई की सुविधा पर निर्भर करता है।
इसलिए ढांखरी आलू की फसल साल में कितनी बार ली जा सकती है, इसका एक ही जवाब सभी क्षेत्रों के लिए सही नहीं होगा। जबकि ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में सामान्यत मार्च-अप्रैल और बहुत ऊंचे क्षेत्रों में अप्रैल-मई के दौरान बुआई की जाती है।
ढांखरी आलू के दाम में उछाल, 60 रुपए किलो तक पहुंचा भाव
ढांखरी आलू की मांग बढऩे के साथ ही इसके दाम में भी जोरदार उछाल देखने को मिल रहा है। इस बार कम पैदावार के चलते बाजार में ढांखरी आलू के भाव 50 से 60 रुपए प्रति किलो तक पहुंच गए हैं। सही समय पर खुदाई कर परिपक्व आलू बाजार में उतारने वाले किसानों को बेहतर दाम मिल रहे हैं। क्षेत्र के बार इलाके में इस वर्ष ढांखरी आलू की पैदावार में काफी गिरावट दर्ज की गई है।
व्यापारी मदन राणा ने बताया कि सीजन की शुरुआत में समय से पहले खुदाई किए गए आलू का भाव 25 से 30 रुपए प्रति किलो तक रहा। हालांकि अब पूरी तरह परिपक्व आलू की खरीद 40 से 45 रुपए प्रति किलो के हिसाब से की जा रही है, जबकि बाजार में यही आलू 50 से 60 रुपये प्रति किलो तक बिक रहा है।

