हिमखबर डेस्क
हिमाचल प्रदेश के चम्बा की ऐतिहासिक पहचान केवल यहां के मंदिरों, कला और संस्कृति तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां की सदियों पुरानी हस्तशिल्प परंपराएं भी देश-दुनिया में अपनी अलग पहचान रखती हैं। इन्हीं में शामिल है चम्बा चप्पल, जो कभी चम्बा के राजा-महाराजाओं के पैरों की शान हुआ करती थी और आज बदलते दौर में फैशन के साथ-साथ रोजगार का साधन भी बन रही है।
राजघराने के समय से चली आ रही कला
कहा जाता है कि चम्बा में चप्पल बनाने की यह कला राजघराने के समय से चली आ रही है। मान्यता है कि चप्पल तैयार करने वाले कारीगर राजा के दहेज के साथ चंबा पहुंचे थे और उनके वंशज आज भी इस पारंपरिक कला को आगे बढ़ा रहे हैं। करीब 15वीं शताब्दी से चली आ रही इस कला को चंबा के कारीगर पीढ़ी-दर-पीढ़ी संजोते आए हैं।
कभी हाथ से तैयार होने वाली इन चप्पलों पर जरी, रेशम और तिल्लेदार कढ़ाई की जाती थी। राजघराने में राजा और महारानियां इन विशेष चप्पलों को बड़े गौरव के साथ पहनते थे। इसका प्रमाण आज भी चम्बा मुख्यालय के भूरी सिंह संग्रहालय में लगे राजाओं के चित्रों के पैरों पर पहनी चम्बा चप्पल में साफ दिखता है।
हाथ की बारीक कढ़ाई और आकर्षक डिजाइन इसकी सबसे बड़ी पहचान रहे हैं। यही वजह है कि समय बीतने के बावजूद चंबा चप्पल का आकर्षण कम नहीं हुआ। चम्बा चप्पल को Geographical Indication यानी GI टैग मिलने के बाद इसकी पहचान को नई ऊंचाई मिली है। सरकार की ओर से इस पारंपरिक कला से जुड़े कारीगरों को विभिन्न मेलों और प्रदर्शनियों में मंच उपलब्ध करवाया जा रहा है, ताकि चम्बा की इस विरासत को देश-दुनिया तक पहुंचाया जा सके।
हाल ही में आयोजित अंतरराष्ट्रीय मिंजर मेले में भी चम्बा चप्पल को विशेष मंच मिला। इस कला से जुड़े कारीगरों को निशुल्क स्टॉल उपलब्ध करवाए गए, जहां उन्होंने अपनी पारंपरिक कला और उत्पादों का प्रदर्शन किया। प्रदेश और देश के विभिन्न मेलों में भी चम्बा चप्पल को स्थान मिलने से इसकी बिक्री और पहचान दोनों में इजाफा हो रहा है।
रोजगार का जरिया
चम्बा चप्पल अब केवल विरासत नहीं रही, बल्कि युवाओं के लिए रोजगार का जरिया भी बन रही है। बदलते समय के साथ पारंपरिक डिजाइन में आधुनिकता का समावेश किया जा रहा है। ग्राहकों की मांग के अनुसार चप्पलों को आकर्षक रूप दिया जा रहा है हालांकि, हाथ से होने वाली तिल्लेदार कढ़ाई करने वाली महिलाओं की संख्या पहले की तुलना में कम हुई है, लेकिन युवा पीढ़ी इस कला में नए अवसर तलाश रही है। पारंपरिक तरीके से चप्पल तैयार करने के साथ अब मशीनों का भी सीमित उपयोग किया जा रहा है हालांकि इसकी मूल पहचान और अधिकांश काम आज भी हाथ से ही किया जाता है।
क्या बोले कारीगर?
राजकाल से इस व्यवसाय से जुड़े 80 वर्षीय कारीगर गुरदयाल बताते हैं कि उन्होंने महज 10 वर्ष की उम्र से चंबा चप्पल बनाने का काम शुरू कर दिया था। उनके हाथों से तैयार की गई चप्पलें कभी राजा के पैरों की शोभा बढ़ाया करती थीं। आज भी वह राजकाल में तैयार होने वाले डिजाइन की चप्पल बनाने में सक्षम हैं।
उनके मुताबिक राजा और रानी हाथ से तैयार की गई जरी और रेशम की कढ़ाई वाली चप्पलें पहना करते थे और उनका परिवार तब से लेकर आज तक इसी पारंपरिक व्यवसाय से जुड़ा हुआ है। पिछले करीब 20 सालों से चम्बा चप्पल बनाने के कार्य से जुड़े युवा कारीगर अनिल कुमार बताते हैं कि यह उनके परिवार का पैतृक व्यवसाय है।
15वीं शताब्दी से चंबा में चली आ रही इस परंपरा को उनके परिवार ने पीढ़ियों से संभालकर रखा है। पहले चंबा चप्पल में रेशम के धागों और तिल्लेदार कढ़ाई का अधिक इस्तेमाल होता था, लेकिन समय के साथ इसमें बदलाव आया है। अब मांग के अनुसार मशीन की मदद से स्टिचिंग की जाती है, जबकि चप्पल के निर्माण और डिजाइन में हाथ का काम आज भी महत्वपूर्ण है।
उनके मुताबिक देश के विभिन्न राज्यों से आने वाले लोगों के साथ-साथ विदेशी पर्यटक भी चम्बा चप्पल को काफी पसंद करते हैं और चम्बा घूमने आने वाले कई पर्यटक इसे अपनी यादगार के तौर पर जरूर खरीदते हैं। चम्बा चप्पल आज उस विरासत की कहानी बयां कर रही है, जिसे कारीगरों ने सदियों से अपने हुनर और मेहनत के दम पर जिंदा रखा है।
कभी राजदरबार की शान रही यह चप्पल अब देश-विदेश के पर्यटकों को आकर्षित कर रही है। GI टैग और सरकारी स्तर पर मिल रहे मंच से इस पारंपरिक कला को नई पहचान मिल रही है। ऐसे में उम्मीद है कि चंबा चप्पल की यह सदियों पुरानी विरासत आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचेगी और राजाओं के पैरों की शान रही यह चप्पल भविष्य में युवाओं के लिए सम्मानजनक रोजगार का मजबूत माध्यम भी बनेगी।

