
कांगड़ा – राजीव जसवाल
हर वर्ष की तरह हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा शहर से सात किलोमीटर दूर स्थित समीरपुर गांव में ऊंचाई पर मौजूद कालका माता मंदिर में लगने वाला मेला इस वर्ष जून माह में आयोजित किया गया। मेले में हजारों लोगो ने अपनी उपस्थिति दी।
कुल मिलाकर करोना के लंबे दौर के अत्यधिक कम होने के बाद इस तरह का मेला करीब 2 साल बाद यहां आयोजित हो पाया है जिससे कई प्रकार के लोगो को रोजगार भी मिला। लोगो ने विभिन्न तरह की दुकानों में भी जमकर खरीददारी की।
बच्चो के लिए इस मेले में झूलों का प्रबंध भी किया गया था। जिसमे कई बच्चे उत्साहित होकर झूल रहे थे। झूले लगाने वाले भी इस दौरान बेहतरीन काम होने के साथ काफी खुश नजर आए। इस मेले में विशाल लंगर का भी आयोजन किया गया था जिसमे हजारों की तादात में दिनभर भारी संख्या में दर्शनों के लिए पहुंचे लोगो ने दर्शन करने के उपरांत लंगर ग्रहण किया।
मेले के लिए कांगड़ा शहर की शुरुआत से ही कई प्रकार के खाने पीने की वस्तुओ के मुफ्त स्टाल रास्तों पर लोगो की सुविधा के लिए लगाए गए थे। जिनमे ठंडे पानी की छबीले, हलवे, फ्रूट, नींबू पानी, खीर और पकौड़े इत्यादि के स्टॉल स्थानीय लोगों द्वारा लगाए गए थे।
इस दौरान कालका बस सर्विस की कई बसे लोगो के लिए फ्री में अपनी सेवाएं दे रही थी। मेला कमेटी द्वारा भी बेहतरीन सुविधाएं लोगो के लिए यहां देखने को मिली। मेले में मौजूद पुलिस कर्मियों ने बताया कि यहां बेहतरीन तरीके से मेला आयोजित किया गया है लोग भी अपनी श्रद्धा अनुसार दर्शनों के लिए यहां आ रहे है।
यहां के स्थानीय निवासी प्रकाश चंद तनोद्रा सेहरिया ने उज्ज्वल हिमाचल से बातचीत में बताया कि मंदिर में गोल पिंडी रूप में स्थित माता कालका मां काली के रूप में भी जानी जाती है। मुगलकाल में चकवन शमीरपुर एक वीरान जंगल होता था जहां पशु चराने के दौरान गवालों को एक गोल पत्थर दिखा और उन्होंने उसे कुछ दूरी पर ले जाकर खेलना शुरू कर दिया।
अगले दिन पत्थर उसी स्थान पर उन्हें दिखा जहां वह उन्हें मिला था गवालों के अचरज की सीमा नहीं रही इसके बाद उक्त रहस्य के चमत्कार की चर्चा गांव के मुखिया तक पहुंची। मुखिया ने पत्थर के रहस्य को परखने के लिए एक आदमी को दूर बहती नदी में पत्थर बहा देने को कहा। लेकिन गांव वाले उस समय दंग रह गये जब पत्थर आदमी के वापिस पहुचने से पहले ही यथावत अपने स्थान पर स्थापित हो गया।
इसके कुछ समय बाद एक देवी रूप कन्या ने मां का गुणगाण करते हुए कहा कि यह पत्थर मां काली का रूप है इसकी स्थापना से यहां कोई भी भयंकर बीमारी अथवा महामारी नहीं फैलेगी।
उस समय गांव में महामारी फैली हुई थी जिसमे करीब 100 से अधिक लोग अपनी जान गवा चुके थे व कई अन्य महामारी की चपेट में आ चुके थे। यह गांव सड़क की सुविधा से भी मेहरूम था।
मंदिर के नजदीक एक पीपल की बड़ी शाखा टूटने पर प्रकट हुई एक औरत ने कहा कि वो भयंकर बीमारियों से लड़ कर आई है इसीलिए उसके शरीर से खून बह रहा है तथा उसे स्नान करा कर नदी के पार पांच बलि अर्पित करने से यहां महामारी नहीं रहेगी।
तब से आज तक माता कालका का मंदिर लोगों की कई प्रकार की बीमारी से रक्षा करने व मनोकामना पूर्ण करने के लिये काफी प्रसिद्ध हो चुका है। स्थानीय लोगों के अनुसार कालका माता की कृपा से इस क्षेत्र में हुई दुर्घटनाओं में उन्हें अबतक कोई जानी नुकसान नहीं हुआ है।
