
परागपुर- आशीष कुमार
आज हम आपको एक ऐसे मंदिर के इतिहास के बारे में बताएंगे जो जिला कागड़ा के विधानसभा जसवां प्रागपुर के क्षेत्र में पड़ता है। उसको सभी जानते है कालीनाथ कालेश्वर महादेव के नाम से । यह ऐतिहासिक मंदिर हेरिटेज विलेज परागपुर से महज 10 या 15 किलोमीटर की दूरी पर स्तिथ है।
जाने इस मंदिर के इतिहास के बारे में :-
मार्कंडेयपुराण के अनुसार आज से हजारों वर्ष पूर्व धरती पर एक असुर हुआ करते थे जिसका नाम था रक्तवीज और महिषासुर। कालीनाथ कालेश्वर महादेव मंदिर का इतिहास भी इसी कहानी से जुड़ा बताया जाता है। कथनानुसार जब देवी काली ने रक्तवीज महिषासुर आदि असुरों का बध किया। उसके बाद भी देवी काली का क्रोध शांत नही हुआ। देवी काली क्रोध में धरती को बिना देखे अट्टहास करती हुई विचरण करने लगी। देवी काली का क्रोधित रूप देखकर देवता, मुनि भयभीत होने लगे तीन लोक में हाहाकार मच गया ।
तब सब देवता भगवान शंकर के पास गए। तब देवताओं के याचना करने पर भगवान महादेव देवी काली के रास्ते मे लेट गए। जैसे ही देवी काली का पैर भगवान शंकर के ऊपर आया देवी काली की जिह्वा उनके दांतो के बीच वाहर की तरफ आ गई। देवी को आत्मग्लानि होनी लगी। देवी काली को अहसास हुआ कि उन्होंने अपने स्वामी महादेव के ऊपर पैर रख दिया। देवी काली को पाप अनुभूति होने लगी।
तब काली माता ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए प्रयाश्चित के लिए जिस स्थान पर दाहिने पैर के एक अंगूठे पर खड़े होकर हजारों वर्ष तपस्या की थी, तब भगवान शंकर ने देवी को दर्शन दिए और लिंग के रूप में उसी स्थान में विराजमान हुए। तब से इस स्थान को कालीनाथ महादेव के नाम से जाना जाता है।
पांडवों के अज्ञातवास से रहा है इस स्थान का नाता :-
किवदंती के अनुसार पांडव अपने अज्ञातवास के समय इस स्थान पर रहे थे। जिनके निशान आज भी यहाँ देखे जा सकते है। एक सर्वे के अनुसार 15 वी सदी में इस मन्दिर का निर्माण पांडवों द्वारा किया गया है। मन्दिर की सीढ़ियों को भी पांडवों द्वारा निर्मित बताया जाता है ।
पंचतीर्थी जलाशय का पांडवों से संबद्ध :-
द्वापर युग के समय जब पांडव अज्ञात वास में कालीनाथ कालेश्वर नामक स्थान पर थे तो, उनके साथ माता कुंती भी उनके साथ थी। तो माता कुंती ने व्रत रखा हुआ था। तो उस व्रत को पूर्ण करने के लिए पांच तीर्थो के जल की आवश्यकता थी। कथनानुसार अर्जुन ने तब अपना बाण धरती पर चलाया। जहाँ से जल की एक शिरा निकली। उस शिरा को ही आज पांच तीर्थो का जल कहा जाता है। जोकि आज भी निरंतर बह रही है ।।
मन्दिर के बारे में प्रचलित मान्यता :-
मन्दिर में विराजमान शिवलिंग के बारे में मान्यता है कि ये शिवलिंग चावल के ज्यो के जितना हर वर्ष जमीन में धस रहा है। मान्यता है कि कलियुग के चरम के समय पाताललोक में समा जाएगा। लोक मान्यता के अनुसार कालेश्वर तीर्थ का महत्व हरिद्वार से ज्यों भर ऊँचा माना जाता है। जो लोग हरिद्वार जाकर परिजनों का अस्थि विसर्जन नही कर पाते है, वो कालेश्वर में आकर अस्थि विसर्जन करते है।
वर्षभर आते रहते है श्रद्धालु :-
बैसे तो देशभर से श्रद्धालुओं का आवागमन वर्षभर मन्दिर में लगा रहता है लोग कालीनाथ महादेव के दर्शन करने आते रहते है पर सावन महीने में इसका महत्व और भी बढ़ जाता है क्योकि शास्त्रों के अनुसार सावन मास भगवान शकर को अतिप्रिय है जो भी इस महीने में भगवान महादेव के दर्शन करता है उसको अनंतगुना फल प्राप्ति होती है ।।
वर्तमान में 2018 से मंदिर का अधिग्रहण हिमाचल सरकार द्वारा किया गया है। शिवरात्रि में मंदिर दर्शन का महत्त्व और भी बढ़ जाता है।
