साहित्य के सोदर्थी भरत सिंह की गद्दी समुदाय के ऊपर आ रही पुस्तक

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चम्बा- भूषण गुरुंग

भरत सिंह जो सिहुंता के मूल निवासी है और लोक साहित्य के सोदर्थी है। बहुत जल्द उनकी पुस्तक गद्दी समुदाय के ऊपर आने वाली है। जिसके कुछ भाग आपके सामने उन्होंने रखे है।

ब्रह्मपुर (भरमौर) रियासत की गद्दी (राज सिंहासन) की स्थापना राजा मारू (550ई०) और स्थानीय क्षत्रिय (गद्दी) कबीलों ने की थी। ब्रह्मपुर रियासत की राजगद्दी पर स्थानीय क्षत्रिय (राजपूत) कबीलों का राज्यभिषिक्त होने के कारणवश कालान्तर में इन 5-6 (सूर्य, चन्द्र वंशीय आदि) क्षत्रिय कबीलों की संतति ‘गद्दी’ के नाम से लोक में प्रचलित एवं प्रसिद्ध हुई।

वास्तव में गद्दी शब्द सिंहासन अथवा राजसिंहासन से जुड़ा हुआ है। परंतु भूलवश कुछ लोग भेड़ बकरियों को चराने वाले तंती-पाल अथवा पुहाल को गद्दी समझते एवं मानते हैं । जबकि गद्दी शब्द का सीधा अर्थ- राजसिंहासन से है। आरम्भ में इस राज्य की सीमा भरमौर के आस-पास तक सीमित थी लेकिन कालान्तर में राजा मेरु वर्मन के शासनकाल में ब्रह्मपुर की गद्दी सेना ने कुल्लू के राजा को हराकर भरमौर में सम्मिलित कर लिया था। जहाँ पर गद्दी सेना ने डेरा लगाया था वह आज भी गद्दी पद्धर के नाम से जाना जाता है।

इस कालखण्ड में गद्दी सेना ने कुल्लू, लाहौल-स्पीति और छत्तराड़ी, गूँ आदि के राणाओं को हराकर ब्रह्मपुर रियासत में मिला लिया था। उसके पश्चात साहिल वर्मन ने भरमौर रियासत का विस्तार वर्तमान चम्बा, चुराह, धौलाधार की तलहटी( बडाभंगाल) अर्थात बैजनाथ-जोगिन्दर नगर तक किया और अपनी राजधानी चम्बा में स्थानांतरित कर दी।

10वीं शताब्दी के पश्चात गद्दी लोग पिछड़ते गए और बाहर से आये लोगों ने अपना वर्चस्व बनाना शुरू कर दिया। जबकि वास्तविकता यही है कि भरमौर-चम्बा रियासत के संस्थापक ‘वीर-गद्दी’ ही थे। प्रस्तुत मानचित्र ब्रह्मपुर और उनके साथी राजन्यकों का है जो कभी औदुम्बरों के गणराज्य का अभिन्न हिस्सा थे। इतिहास को छुपाया जा सकता है लेकिन मिटाया नहीं जा सकता.

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