सुभाष पालेकर प्राकृतिक खेती खुशहाल किसान योजना के तहत लोगों को दी जानकारी

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शाहपुर- नितिश पठानियां

उपमंडल शाहपुर के तहत रैत ब्लॉक की दरगेला पंचायत के वार्ड न 1 के तहत बलविंदर सिंह पठानियां द्वारा आयोजित सुभाष पालेकर प्राकृतिक खेती खुशहाल किसान योजना कार्यक्रम में रैत ब्लाक के तकनीकी प्रबंधक हरीश कुमार सहायक तकनीकी प्रबंधक नितिका सूद, सोनाली शर्मा और प्रशिक्षु किसान सिमलो देवी ने दो दिवसीय कैंप में लोगो को सुभाष पालेकर प्राकृतिक खेती खुशहाल किसान योजना के तहत विस्तृत जानकारी दी।

तकनीकी प्रबंधक हरीश कुमार सहायक तकनीकी प्रबंधक नितिका सूद, सोनाली शर्मा और प्रशिक्षु किसान सिमलो देवी ने लोगो को जानकारी देते हुए बताया कि सुभाष पालेकर प्राकृतिक खेती पद्धति से फसलों को उगाने में किसी भी प्रकार की रासायनिक खादों, कीटनाशकों इत्यादि के प्रयोग के बिना सफल एवं सतत् खेती कर किसान जहर मुक्त खाद्यान्न का उत्पादन कर सकता है।

इस तरह वह खेती उत्पादन लागत को बहुत ही कम या शून्य कर अपने परिवार की आर्थिकी को बढ़ा सकता है। साथ ही समाज के अन्नदाता के रूप में स्वस्थ भोज्य पदार्थ उपलब्ध करवा कर स्वस्थ भारत- समद्ध परिवेश’ के स्वप्न को भी साकार करने में अपनी समर्थ भूमिका अदा कर सकता है।

मुख्य फसल की लागत का मूल्य अन्तर्वर्ती / सह फसल के उत्पादन से निकाल लेना और मुख्य फसल शुद्ध मुनाफे के रूप में लेना ही ‘सुभाष पालेकर प्राकृतिक खेती’ है। इसमें खेती के लिए आवश्यक कोई भी संसाधन बाजार से नहीं खरीदना है। इन सभी संसाधनों या आदानों की निर्मिती घर में, खेत में या गांव में ही की जाती है।

उन्होंने बताया कि प्राकृतिक खेती के संचालन के चार स्तंभ है।

1 जीवामृत किसी भी भारतीय नस्ल की गाय के गोबर, मूत्र तथा अन्य स्थानीय उपलब्ध सामग्रियों जैसे गुड़, दाल का आटा तथा अदूषित एवं संजीव मिट्टी के मिश्रण से बनाया हुआ घोल भूमि मे सुक्ष्म जीवाणुओं की संख्या में बढ़ोतरी करता है। परम्परागत खेती से यह प्राकृतिक खेती अलग है क्योंकि इसमें गाय का गोबर और मूत्र, जैविक खाद के रूप में नहीं बल्कि एक जैव-जामन के रूप में प्रयोग किया जाता है। यह जामन, भूमि में लाभदायक सूक्ष्म जीवाणुओं एवं स्थानीय कंचुओं की संख्या एवं गतिविधियों को सर्वश्रेष्ठ स्तर तक बढ़ाकर जमीन में पहले से अनुपलब्ध आवश्यक पौष्टिक तत्वों की पौधों को उपलब्धता सरल करता है। इससे पौधों की हानिकारक जीवाणुओं से सुरक्षा तथा भूमि में जैविक कार्बन की मात्रा में बढ़ोतरी होती है।

2 बीजामृत देसी गाय के गोबर, मूत्र एवं बुझा चूना आधारित घटक से बीज एवं पौध जड़ों पर सूक्ष्म जीवाणु आधारित लेप करके इनकी नई जड़ों को बीज या भूमि जनित रोगों से संरक्षित किया जाता है। बीजामृत प्रयोग से बीज की अंकुरण क्षमता में अप्रत्याशित वृद्धि देखी गई है।

3 आच्छादन भूमि में उपलब्ध नमी को सुरक्षित रखने हेतू इसकी किसी अन्य फसल या फसलों के अवशेष से ढ़क दिया जाता है। इस प्रक्रिया से ह्यूमस का वृद्धि भूमि की उपरी सतह का संरक्षण, भूमि में जल संग्रहण क्षमता सूक्ष्म जीवाणुओं तथा पौधों के लिए आवश्यक पोषक तत्वों की मात्रा में बढ़ोतरी के साथ खरपतवार का भी नियंत्रण होता है।

4 वापसा ( भूमि में वायु प्रवाह): यह वापसा, भूमि में जीवामृत प्रयोग तथा आच्छादन का परिणाम है। जीवामृत के प्रयोग तथा आच्छादन करने से भूमि की सरचना में सुधार होकर त्वरित गति से ‘ह्यूमस’ निर्माण होता है। इस से अन्ततः भूमि में अच्छे जल प्रबंध की प्रक्रिया आरम्भ होती है। फसल न तो अधिक वर्षा तूफान में गिरती है और न ही सूखे की स्थिति में डगमगाती है।

प्राकृतिक खेती खुशहाल किसान योजना के अंतर्गत दिए जाने वाले अनुदान

देसी गाय पर अनुदान, 50%, अधिकतम अनुदान रु०25000/

देसी गाय के परिवहन अनुदान, दूरी के अनुसार, अधिकतम अनुदान रु०5000 /

देसी गाय की मंडी फीस पर अनुदान, रु०2000/

गौशाला का फर्स पक्का करना गोमुत्र संग्रहण पिट बनाना, 80%, अधिकतम अनुदान रु० 8000 /

प्राकृतिक खेती के अंतर्गत घोल बनाने के लिए अनुदान प्लास्टिक ड्रम 200 लीटर क्षमता तक, 75%, अधिकतम अनुदान रु०2250/- 750

संसाधन भंडार, रु०10000/ प्रति किसान

फसल सुरक्षा प्राकृतिक कीटरोधक

  1. नीमास्त्र (एक एकड़ (5 बीघा / 10 कनाल) भूमि के लिए)

सामग्री= पानी, गौमूत्र,गोबर,नीम या स्थानीय रूप से उपलब्ध पौधे में से किसी एक की हरी पत्तियां या सूखे फल

मात्रा=100 लीटर, 5 लीटर, 1 कि० ग्रा०, 5 कि० ग्रा०

विधि : ड्रम में नीम की पत्तियों की चटनी, और गोमूत्र व गोबर डालें| इन सभी सामग्रियों को डंडे से घोलकर जूट की बोरी से ढ़क दें। इस मिश्रण को 48 घंटे के 1 कि० ग्रा० लिए छोड़ दें और इस दौरान सुबह-शाम 2-2 मिनट घोलें। तैयार होने के बाद इसका छिड़काव करें। नीमास्त्रा का प्रयोग छः माह तक कर सकते है।

2. ब्रह्मास्त्र (बड़ी सूडियों/ इल्लियों के लिए उपयोगी)

सामग्री= गौमूत्र 20 लीटर, आम, अमरूद, अरंडी के पत्तों की चटनी (ब) स्थानीय’ पौधे मे से किसी दो के पत्तों की चटनी 2-2 कि० ग्रा०

विधि: पत्तों चटनी को गौमूत्र में डाल श्रीमी आंच पर एक उबाल आने तक गर्म करें। 48 घंटे तक ठंडा होने के लिए रख दें। 2.5-3 लीटर घोल को 200 लीटर पानी में मिला कर 1 एकड़ फसल पर छिड़काव करें। घोल का प्रयोग 6 माह तक किया जा सकता है।

3. फफूंदनाशक (फफूंद नियंत्रण के लिए उपयोगी)

सामग्री= खट्टी लस्सी (4,5 दिन पुरानी) मात्रा 5 लीटर, पानी 200 लीटर

विधिः पानी व खट्टी लस्सी को अच्छी प्रकार से मिलाकर 1 एकड़ छिड़काव करें। नोट: यह विषाणु (वायरस) नाशक भी है।

इस अवसर पर रैत ब्लाक के तकनीकी प्रबंधक हरीश कुमार सहायक तकनीकी प्रबंधक नितिका सूद, सोनाली शर्मा और प्रशिक्षु किसान सिमलो देवी, स्थानीय लोग उपस्थित रहे ।

 

 

 

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