पिता द्वारा स्कूल के लिए जमीन दान करने की पहल को बेटे DFO रामगोपाल शर्मा ने आगे बढ़ाया। स्कूल के विकास और समाजसेवा से जुड़े उनके प्रयासों ने सेवा को उनके जीवन का अहम हिस्सा बना दिया।
सिरमौर – नरेश कुमार राधे
कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिनकी पहचान केवल पद से नहीं, बल्कि समाज के लिए किए गए कार्यों से बनती है। धारटीधार क्षेत्र की भरोग बनेड़ी पंचायत के खैना गांव में जन्मे स्वर्गीय रामगोपाल शर्मा जी का जीवन भी ऐसी ही प्रेरणादायक कहानी है।
8 सितंबर 1939 को जन्मे रामगोपाल शर्मा ने भरोग बनेड़ी स्कूल के शुरुआती विद्यार्थियों में शामिल होकर शिक्षा का सफर शुरू किया और अपनी मेहनत, लगन व कर्तव्यनिष्ठा के बल पर वन विभाग में डीएफओ के पद तक पहुंचे।
सरकारी सेवा से सेवानिवृत्ति के बाद भी उनका गांव और समाज से जुड़ाव बना रहा। 16 सितंबर 2026 को प्रातः करीब 9 बजे उनके निधन से भरोग बनेड़ी सहित पूरे धारटीधार क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई।
पिता के संस्कारों ने दिखाई समाजसेवा की राह
रामगोपाल शर्मा के जीवन की सबसे बड़ी प्रेरणाओं में उनके पिता स्वर्गीय नारायण दास के समाजसेवी कार्य शामिल रहे। नारायण दास ने क्षेत्र में शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं को बढ़ावा देने के उद्देश्य से स्कूल और आयुर्वेदिक डिस्पेंसरी के लिए भूमि दान की थी। उनका उद्देश्य था कि धारटीधार क्षेत्र के लोगों को शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए दूर-दराज के क्षेत्रों में न जाना पड़े।
पिता के इसी सेवाभाव को रामगोपाल शर्मा जी ने अपने जीवन में आगे बढ़ाया। उन्होंने यह साबित किया कि समाजसेवा के लिए किसी बड़े पद या विशेष अवसर की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि अपने आसपास के लोगों की जरूरतों को समझकर किया गया छोटा-सा प्रयास भी आने वाली पीढ़ियों के लिए बड़ी मिसाल बन सकता है।
स्कूल की छत के लिए बिरोजा फैक्ट्री से लाए टीन के कनस्तर
भरोग बनेड़ी स्कूल से रामगोपाल शर्मा का लगाव जीवनभर बना रहा। बताया जाता है कि उस समय स्कूल का भवन छान के रूप में था। जब उन्होंने बिरोजा फैक्ट्री में नौकरी शुरू की तो वहां से टीन के कनस्तर लाकर अपने पिता के निर्देशानुसार स्कूल की छत पर टीन लगाने में सहयोग किया।
यह कार्य उस समय स्कूल के विद्यार्थियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण था। बारिश और खराब मौसम के दौरान बच्चों को परेशानी न हो, इसी उद्देश्य से स्कूल भवन को बेहतर बनाने में उन्होंने योगदान दिया। स्कूल के शुरुआती विद्यार्थी के रूप में पढ़ाई शुरू करने वाले रामगोपाल शर्मा का अपने ही विद्यालय की सुविधा के लिए काम करना उनके सेवाभाव और अपनी जड़ों से जुड़े रहने की भावना को दर्शाता है।
पेयजल की व्यवस्था में भी निभाई भूमिका
भरोग बनेड़ी स्कूल में विद्यार्थियों के लिए पेयजल की समस्या को देखते हुए भी रामगोपाल शर्मा ने महत्वपूर्ण पहल की। उन्होंने स्कूल तक पानी पहुंचाने के लिए पाइपलाइन बिछाने में सहयोग किया। शुरुआत में प्लास्टिक की झौकी पाइप के माध्यम से पानी पहुंचाने की व्यवस्था की गई और बाद में लोहे की पाइपलाइन भी बिछाई गई।
आज स्कूलों में पेयजल सुविधा एक सामान्य आवश्यकता लगती है, लेकिन उस समय ग्रामीण क्षेत्र में बच्चों के लिए पानी की व्यवस्था करना अपने आप में महत्वपूर्ण कार्य था। रामगोपाल शर्मा ने विद्यार्थियों की इस मूलभूत जरूरत को समझा और अपनी भूमिका निभाई। उनके लिए स्कूल केवल शिक्षा प्राप्त करने का स्थान नहीं था, बल्कि वह उनके जीवन का हिस्सा और समाज के भविष्य को संवारने का माध्यम था।
डीएफओ पद तक पहुंचे, लेकिन गांव से नाता नहीं छोड़ा
रामगोपाल शर्मा जी ने वन विभाग में डीएफओ के पद तक पहुंचकर सरकारी सेवा की और सेवानिवृत्त हुए। यह उपलब्धि उनकी मेहनत, लगन और कर्तव्यनिष्ठा को दर्शाती है। वन विभाग में सेवा के दौरान पर्यावरण और वन संरक्षण से जुड़े दायित्वों का निर्वहन करने के बाद भी उनकी पहचान केवल एक अधिकारी के रूप में नहीं रही।
वे भरोग बनेड़ी के नंबरदार के रूप में भी अपनी जिम्मेदारी निभाते रहे। इस भूमिका में उनका गांव और स्थानीय लोगों के साथ निरंतर संपर्क बना रहा। वे क्षेत्र की सामाजिक गतिविधियों और लोगों की जरूरतों से जुड़े रहे। उच्च सरकारी पद पर पहुंचने के बावजूद उन्होंने अपनी जन्मभूमि को कभी नहीं भुलाया।
स्थानीय लोगों के अनुसार, रामगोपाल शर्मा का स्वभाव सहयोगी और सेवाभावी था। भरोग बनेड़ी के गरीब और जरूरतमंद परिवारों की सहायता करना उनके स्वभाव का हिस्सा रहा। वे अपने क्षेत्र के लोगों की समस्याओं को समझते थे और यथासंभव उनकी मदद करने का प्रयास करते थे।
सरकारी सेवा में महत्वपूर्ण पद पर रहने और गांव के नंबरदार की जिम्मेदारी निभाने के बावजूद उनका आम लोगों से आत्मीय संबंध बना रहा। यही जुड़ाव उन्हें क्षेत्र के लोगों के बीच सम्मान दिलाता रहा।

