सावन की फुहारें और पतरोड़ों की खुशबू… हिमाचली पतरोड़े सिर्फ स्वाद ही नहीं, बल्कि पहाड़ की समृद्ध परंपरा और पारंपरिक खानपान की खास पहचान भी हैं। सावन आते ही घरों में इस देसी जायके की महक घुलने लगती है।
शाहपुर – नितिश पठानियां
सावन की रिमझिम फुहारें, चारों ओर पसरी हरियाली और घरों से आती पारंपरिक पकवानों की खुशबू… हिमाचल के पहाड़ों में इन दिनों मौसम के साथ खानपान का रंग भी बदल जाता है। अरबी के कोमल पत्तों से तैयार होने वाले पतरोड़े इसी बदलते मौसम और पहाड़ी परंपरा की खास पहचान हैं। सावन आते ही कई घरों में पतरोड़े बनाने की तैयारी शुरू हो जाती है।
स्वादिष्ट होने के साथ-साथ यह व्यंजन हिमाचल की लोक संस्कृति, पारिवारिक मेल-जोल और पीढिय़ों से चली आ रही परंपराओं से भी गहराई से जुड़ा है। प्रदेश के पारंपरिक खानपान में पतरोड़े यानी पतरोड़े का विशेष स्थान है।
बरसात के मौसम में जब पहाड़ों की ढलानों और खेतों के आसपास अरबी के ताजे, हरे और नरम पत्ते खूब दिखाई देने लगते हैं, तो इनका इस्तेमाल स्वादिष्ट पतरोड़े बनाने में किया जाता है। घर की महिलाएं पारंपरिक तरीके से पत्तों को तैयार कर उनमें मसालेदार मिश्रण लगाती हैं। इसके बाद इन्हें लपेटकर पकाया जाता है और फिर स्वादानुसार काटकर परोसा जाता है।
परंपराएं भी रोचक
पतरोड़ों का स्वाद जितना खास है, उनसे जुड़ी परंपराएं भी उतनी ही रोचक हैं। सावन की संक्रांति और भादों के आगमन पर मनाए जाने वाले पारंपरिक पर्वों में पतरोड़े और खीर बनाने की परंपरा कई क्षेत्रों में आज भी कायम है। रिखोली और सैर जैसे पारंपरिक उत्सवों के दौरान घरों में विशेष पकवान तैयार किए जाते हैं। परिवार के सदस्य एक साथ बैठकर भोजन करते हैं और त्योहार की खुशियां साझा करते हैं।
रिश्तों को जोडऩे का जरिया
पहाड़ी समाज में भोजन केवल पेट भरने का माध्यम नहीं रहा, बल्कि यह रिश्तों को जोडऩे का जरिया भी रहा है। त्योहारों के अवसर पर तैयार किए गए पतरोड़े रिश्तेदारों, पड़ोसियों और मित्रों के घर भेजने की परंपरा आज भी कई गांवों में देखने को मिलती है। एक-दूसरे के घर पकवान पहुंचाना आपसी प्रेम, अपनापन और भाईचारे का प्रतीक माना जाता है।
यह भी खासियत
खास बात यह है कि पतरोड़े बनाने की कला भी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचती रही है। बुजुर्ग महिलाएं नई पीढ़ी को पत्तों का चयन करने, मसाला तैयार करने और पतरोड़ों को सही तरीके से पकाने की पारंपरिक विधि सिखाती हैं। आधुनिक खानपान के दौर में भी यह परंपरा हिमाचल की ग्रामीण संस्कृति को अपनी जड़ों से जोड़े हुए है।
सिर्फ पकवान नहीं…
सावन की बारिश से निखरी पहाड़ों की हरियाली, त्योहारों की रौनक और रसोई से आती पतरोड़ों की खुशबू मिलकर हिमाचल के लोक जीवन की खूबसूरत तस्वीर पेश करती है। यही वजह है कि पतरोड़े आज भी महज एक पारंपरिक व्यंजन नहीं, बल्कि प्रदेश की मिट्टी, संस्कृति, रिश्तों और पहाड़ी जीवनशैली की स्वादिष्ट पहचान बने हुए हैं।
प्रेम और भाईचारे का संदेश
शाहपुर और उसके आसपास के क्षेत्र की महिलाएं बताती है कि सैर और रिखोली जैसे पारंपरिक अवसरों पर घर में खीर और पतरोड़े जरूर बनाए जाते हैं। त्योहारों पर इन्हें रिश्तेदारों और पड़ोसियों में बांटने से आपसी प्रेम और भाईचारा भी बढ़ता है। महिलाओं ने कहा कि नई पीढ़ी को भी इस पारंपरिक व्यंजन और संस्कृति से जोडऩा जरूरी है।

